कितने ख्वाब देखती है आँखे

कितने ख्वाब देखती है आँखे ,

शायद आँखे बेकाबू होती है |

एक ख्वाब को बड़ी जल्दी थी

जल गया वो इस्त्री करते करते

अब कहाँ मुकम्मल होगा

पहनता हूँ उसे तो छेद दिखता है |

कुछ ख्वाब मेहमान से थे

कल छोड़ आया उन्हें स्टेशन

ज्यादा दिन ठहरे मेहमान तो

रिश्ते में कडवाहट आ जाती हें  |

दो चार ख्वाब दुसरो की आँखों के थे

नादान था मैं उन्हें अपना समझ बेठा

रुके कुछ दिन मूलधन की तरह

और जब गए तो ,

कुछ ख्वाब मेरे भी ले गए ,ब्याज में |

वो जो सबसे तेज ख्वाब था ,बेवफा निकला

पूरा होते ही कहने लगा कि

मैं तो तुम्हारी आँखों का हिस्सा ही नहीं |

देखो ना

कमाल का झूठ बोलते है  ख्वाब भी

आदमी से ही सीखे होंगे |

कितना शोर करती हे जिन्दगी ,

कुछ ख्वाबो को अब तक सुन नहीं पाया |

एक ख्वाब ऐसे ही सुनसान बेठा रहता था

आँखों  के किसी कोने में

कल रात उसने पलकों से गिरकर आत्महत्या कर ली |

कुछ ख्वाब शिकायत करने लगे मैंने उसका क़त्ल किया

मै क्या करू ,

आँखों से गिरकर अब तक क्या जिन्दा बचा है कोई |

एक ख्वाब ने ग़ालिब को पढ़ा

तो बारिश में भीग गया

सुखाने के लिए अभी उसे

फैज़ की छत पर डाला है |

एक तो कमजोर निकला ,

सांसे फूल गई उसकी

अभी बारह सीडिया ही चढ़ा था एग्जाम की

और दम तोड़ दिया उसने |

कुछ ख्वाब की उम्र होती है

जेसे ही उस दहलीज़ पर पहुंचे

वसूल रिवाज उनका खून पि जाते है  |

बस एक ख्वाब अब भी जिन्दा है ,

और कभी कभी कहता है

मैं ख्वाब नहीं हकीकत हूँ |

जो ख्वाब बिनाई को छू ले

बस वो ख्वाब मेरा है |

अब आँखे बेकाबू नहीं होती ,

ये ख्वाब मेरा है |

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