साहिर -लफ्जो की इबादत

“मुझसे पहले कितने शायर, आए और आकर चले गए,
कुछ आहें भरकर लौट गए, कुछ नग़मे गाकर चले गए
वो भी एक पल का किस्सा थे, मै भी एक पल का किस्सा हूँ
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा, जो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ”

साहिर की यही बात ,जब साहिर का नाम आता है तो मेरे दिलो-दिमाग का पाचनतंत्र कहीं रुखसत हो जाता है | एक बड़े शायर की सबसे बड़ी बात ये होती है कि वो खुद को इतना आसन बना लेते है या उनका दायरा इतना बड़ा हो जाता है जिसमें लाखो लोग आसानी से सिमट ही नहीं जाते बल्कि किसी न किसी शेर के सहारे खुद को महसूस कर लेते है | प्यार भी तो यही होता है जो खुद को जिन्दा रखे, जो खुद को अहसास दिलाये की मेरे होने का भी वजूद है | यही प्यार तो साहिर से इस दुनिया का है | जब भी उन्हें कोई पढ़ता है तो यकीं आ जाता है की कोई मेरे अल्फाज़ गुनगुना रहा है, कोई मेरे दिल की बात अपनी जुबाँ से बयाँ कर रहा है | आखिर कैसे शायर हर दिल की बात जानता है |

इश्क का असली मतलब पाना नहीं होता, साहिर अमृता की कहानी में ये बात स्पष्ट हो जाती है| इश्क कभी कभी एक ऐसे गोले की परिधि में घूमना होता है जिसमे सारा खेल केंद्राभिमुख शक्ति का सामंजस्य बनाये रखना होता है | इसी केंद्राभिमुख और अपकेंद्री शक्ति में सारे वसूल आ जाते है | अमृता ने कहा है कि उनके प्रति मेरा जो आदर है, वो मेरे पैरों में बेडियों की तरह है जो मैं कभी नहीं तोड़ पाई | साहिर ने भी उसी अंदाज में प्यार को बयाँ किया-

“वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों”

इस तरह का अंदाज़-ए-बयां इस से पहले ग़ालिब की शायरी में देखा गया था | यहाँ वो ये बात कभी नहीं करते की अजनबी बन जायें | ये जो ना भूलने का दर्द है, जो रिश्ता है, जिसका कोई दूसरा छोर नहीं उसे थामने की कोशिश और उस कोशिश की नाकामयाबी का ये गीत हैं |इतनी गहराई साहिर साहब के शेर में होती थी कि उतरो तो एक नई दुनिया मिल जाती थी और भीगो तो बारिश ऐसे होती थी जैसे बरसों किसी अकाल के बाद पानी की बुँदें जमीं पर गिर रही हों | हर बूँद को इस तरह अपना बना लेने ख्वाइश होती है कि जाने ये शेर फिर मिले ना मिले |

चलो शेर की बात ही कर ली जाये | साहिर के शेर जितने गहरे होते थे, उतने ही नाज़ुक दर्द की एक आह उनमे छिपी होती थी | कहीं ना कहीं वो दिल में एक तीर की तरह लगती थी | एक एक शेर पर आप कुछ देर रुककर अपने दिल को तलाशने लग जाते है | ये शेर देखिये –

“तुम मेरे लिए कोई इल्जाम ना ढूँढो
चाहा था तुम्हें एक यही इल्जाम बहुत है |

साहिर फिर एक ऐसी बात पहुँचाने में लगा है जिसे ऊपर ऊपर से पढ लो तो सकूं है की वाह क्या बात है यही तो होता है अक्सर और जैसे ही बात समझ आये तो एक गंभीर चिंतन | यहाँ वो कहना चाहते है कि क्या कोई वजह दूर जाने की तुम ढूंढ रही हो वो मेरे प्यार से बड़ी है ?यहाँ प्यार को कोई इल्जाम या जुर्म नहीं कहा गया ना ये कहा गया है कि जो बहाने या इल्जाम तुम लगा रहे हो वो वाजिब नहीं है| एक बात कि चाहा है तुम्हें क्या इतना काफी नहीं है? की खलिश इस शेर से उठ रही है | फिर एक सवाल साहिर छोड़ जाते है कि अगर वो काफी नहीं है तो फिर इन बातो की, इन इल्जामातो की जरुरत क्या ?

दर्द ही नहीं हर अहसास से उनके गीत तार्रुफ़ कराते है | आज भी किसी को रोकना हो उनका गीत कई दिलो पर काम करता है –

“अभी ना जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं
मैं थोड़ी देर जी तो लूँ, नशे के घूँट पी तो लूँ
अभी तो कुछ कहा नहीं, अभी तो कुछ सुना नहीं”

कभी कभी आशिक अपनी जुबाँ खोलने में नाकामयाब होता है तो ये गीत उसकी भावना बयाँ कर देता है और मुश्किले आसन कर देता है-

“कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए
तू अबसे पहले सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीन पे बुलाया गया है मेरे लिए |”

उन्होंने अपने गीतों से कई सवाल भी उठाये और इस तरह की आज भी मुल्क ख़िज़ा में बेचैनी छाती है तो साहिर के गीत आवाज बनकर सडको पर आ जाते हैं

“ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

कई बार उन्होंने उस्ताद जौन एलिया के अंदाज में अपनी बात स्पष्ट शब्दों में भी कहीं है जैसे-

“तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है”

किसी के साथ होने से क्या फर्क पड़ता है ये बात भी उन्होंने सरल तरीके से लोगो तक पहुंचाई |

“चेहरे पर ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है
जब तुम मुझे अपना कहते हो अपने पर गुरुर आ जाता है |

जब हिज्र की रात गहरी हो जाए और खलिश बेचैन कर दे तो शायर खुद को नापने की कोशिश करने लगता है और ये इश्क के जूनून का अंतिम छोर होता है कि आखिर ऐसा क्या है जो उसमे नहीं और गर किसी में है तो वो क्या है | दर्द ये भी है कि वो जनता है, कि पाक इश्क का इन सब चीज़ों से कोई नाता नहीं है फिर भी वो खुद को रोक नहीं पाता है, यही वक्त खूने इश्क हो जाता है जहाँ कहीं ना कहीं वो खुद पर सवाल उठाता है और खुद को कमजोर मान लेता है | देखिये दर्द को किस तरह चंद अल्फाजो में समेटा है –

“जाने वो कैसे लोग थे जिन के प्यार को प्यार मिला
हम ने तो जब कलियाँ माँगी, काँटों का हार मिला
खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग्में चाहे तो आहें सर्द मिली
दिल के बोझ को दुना कर गया, जो ग़मख़ार मिला”

एक गीत जो कहीं ना कहीं मेरे जिन्दगी का एक हिस्सा हो गया है और कई बार मै घंटो, रात भर उनके इस गीत में खोया रहता हूँ | ये गीत इस बात की ओर जोर देता है कि आखिर जिन्दगी में सबसे जरुरी क्या है |क्या है जो ना हो तो लगता है की सारी चीजो का होना मायने नहीं रखता | क्या कोई शख्स, क्या कोई चीज, क्या कोई अहसास इतना बड़ा भी हो सकता है जिसके आगे हर चीज छोटी हो जाती है या उनके होने से कोई फर्क नहीं पड़ता | क्या कोई अनन्य हो सकता है क्या चाहत कि कोई ऐसी परिकाष्टा भी मुमकिन है जो मुकम्मल ना हो तो कुछ मयस्सर नहीं होता | पढिये ये गीत –

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है
जहाँ प्यार की कद्र कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है .

जला दो इसे फूक डालो ये दुनिया
जला दो, जला दो, जला दो
जला दो इसे फूक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है .

गीत में अपने अन्दर की आग को दुनिया में बयाँ कर साहिर ने काफी कुछ छिपाने की कोशिश की लेकिन शायर जब कुछ छिपाता है तो एक रूप में वो जन्म लेती है और ये गीत फिल्म में इस कदर अंकित हुआ की हिंदी फ़िल्मी गीतों में इसे जेवर की तरह सजा कर रखा जाता है |

चाहे हिन्दू मुस्लिम एकता हो, युद्ध हो, राजनीति हो साहिर ने हर जगह अपनी दस्तक मील के पत्थर जेसी दी है | आकशवाणी में आज जो हम गीत लेखक का नाम सुनते है या फिल्मो में जो गीत लिखने वालो को जगह और इज्जत मिली उसकी बजह साहिर ही है | कुछ गीत गुनगुना लिए जायें –

“ए मेरी जोहरजबीं , तुझे मालूम नही, तू अभी तक है हसीं और मैं जवां”

“ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का
इस देश का यारों क्या कहना, ये देश है दुनिया का गहना”

“छू लेने दो नाज़ूक होठों को, कुछ और नहीं है जाम है ये
कुदरत ने जो हम को बक्शा है, वो सब से हसीं इनाम है ये”

“देखा है जिन्दगी को कुछ इतना करीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से”

चलो जाते जाते एक शेर हो जाये –
“अगर जिन्दगी में मिल गए फिर इत्तिफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम” |

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