वज़ीर – खेल खेल में

शतरंज का खेल बढ़ा ही दिलचस्प खेल है | शह और मात के इस खेल में मोहरों की भूमिका उसकी औकात से नहीं बल्कि उसकी जगह से आंकी जाती है | कभी वज़ीर के पास  अपनी कोई रास्ता नहीं बचता तो कभी प्यादा भी वज़ीर बन जाता | बादशाह अपनी चाल की तलाश में बगले झाँकने लगता है तो घोड़ा बेखोफ भी हो सकता है | एक प्यादे के वजीर बनने की कहानी है वज़ीर |

दानिश (फ़रहान), आतंकवाद विरोधी दस्ते का जवान है जिसकी बेटी की मौत एक अनऔपचारिक मिशन के दौरान हो जाती है | आदिति (दानिश की बीबी) और दानिश के मन में ये बात घर कर जाती है की उनके बेटी की मौत की वजह फ़रहान हैं | ज़ज्बात को नापने की कोई मशीन नहीं होती | सीने में मौजूद आत्मग्लानि जब आग लगाती है तो उसे हवा की जरुरत नहीं पड़ती | खुद से खुद की लड़ाई सबसे दर्दनाक होती है | जहाँ जितना भी खुद से है और हारना भी खुद से, जहाँ जीत जीत नहीं हार होती है और तब खुद का वजूद नागवार गुज़रता है |

पंडित ओमकारनाथ धार (बच्चन साहब ) इस खेल के सबसे माहिर और काबिल खिलाडी है | एक ऐसा शख्स जो व्हील चेयर पर है लेकिन उसकी चाल हैरान कर देती हैं, वो उम्र के अंतिम पड़ाव में है पर उसकी चुस्ती घोड़े सी है | पंडितजी की बेटी की मौत एक हादसे में और बीबी की कार दुर्घटना में हो जाती है | बेटी के साथ हुआ हादसा ही उनकी लड़ाई है उसी के लिए उनकी चाले है उसी के वास्ते ये पूरा शतरंज है| पंडित जी ने शतरंज को ही अपनी जिन्दगी बना लिया है | पंडित जी पूरी तरह से टूट चुके थे लेकिन ये खेल जब तक बादशाह मरता नहीं खत्म नहीं होता | उन्होंने जिन्दगी जीना सीख लिया है | आंसू दर्द देते है पर सबसे दर्दनाक वो गम होता है जब कोई कंधा नहीं होता जिसपर सर रख इत्मिनान से रोया जा सके | रश्मि के शब्दों में टूटना अच्छा होता है क्योंकि जब आदमी फिर से ख़ुद को जोड़ता है तो पहले से बेहतर तरीके से जोड़ता है | लेकिन उसका क्या जो टूट कर जुड़ न पाए ? क्या उनकी भी कोई दास्तान होती है ?

पंडित जी की लड़ाई मंत्री एज़ाद कुरैशी (मानव कौल ) से है | एज़ाद के कई चेहरे है एक चेहरे में उसे शांति सम्मान मिल रहा है तो एक छिपा हुआ चेहरा है जो खोफनाक है | एक प्यादे की क्या बिसात होगी जो बादशाह से टकरा जाये?

क्या हकीकत में प्यादा प्यादा होता है ? ये बिछी हुई मोहरों पर निर्भर करता है कौन क्या है | शशि थरूर कहते है की आप कहाँ खड़े है ये इस बात पर निर्भर करता है की आप कहाँ बैठे है | एक काबिल खिलाडी क्या मुखालिफ़ के चाल चलने का इंतज़ार करता है ? फिल्म में शतरंज प्रतीकात्मक है | खेल में हाथी तब तक शांत बैठा रहता है जब तक उसके सामने का प्यादा मर नहीं जाता | जब साथ का प्यादा मर जाता है तो हाथी, पागल हाथी हो जाता है |

दानिश और आदिति के बीच की ख़ामोशी एक कसक है जो टूटना चाहती है | ख़ामोशी का मतलब संवादहीन होना नहीं होता | क्या सफ़र इस बात पर है की सफ़र में कौन साथ है या सफ़र का अपना अस्तित्व है ? हमसफर का असली मतलब सफ़र तो नहीं ?मनोज मुन्तज़िर के शब्दों में

“तू अगर थक के बैठ जाये, अड़ जाऊंगा में भी वहीँ”

आखिर इश्क़,चाहत में ऐसा क्या है कि ये दर्द उभर कर आता है कि

“बारिशें कितनी दिल से गुजरी ,मेरी आँखे ना भीगी कभी

तू अगर पल भर भी दूर जाये ,बदलो सा रो दूंगा मैं अभी”

पंडित जी दानिश और आदिति की जिन्दगी में उत्प्रेरक बन कर आते है | पंडित जी और दानिश की यारी इस फिल्म की जान है | परदे पर दोनों की मौजूदगी फिल्म का सबसे बेहतर हिस्सा है | जिस तरह इश्क की बुनियाद में निस्वार्थ की भावना का होना जरुरी है उसी तरह दोस्ती की जड़ में भरोसे का | पंडित जी कहते है कि खुदा जब मुझसे मुझसे पूछेगा ऐ ओमकारनाथ इतनी बड़ी जिन्दगी दी क्या उखाड़ लिया ? तो मैं कहूँगा मैंने एक दोस्त बना लिया है | दोस्ती इस बात की गारंटी है कि अगर पंडित जी को कुछ हो गया तो दानिश बादशाह को छोड़ेगा नहीं | यारी आँखों में उस मासूमियत का नाम है जिसमे झूठ  की गुंजाइश नहीं होती | जहाँ बस बेवजह बेकारण, बेपरवाह समर्पण और सहमति होती है | दोस्ती में इल्तिजा नहीं होती बिन बोले बिन सुने एक खामोश हक होता है | शकील ने कहाँ है

“मुझे दोस्त कहने वाले जरा दोस्ती निभा दे                                                                                  ये मुतालिबा है हक का कोई इल्तिजा नहीं”

यारी एक ऐसा रिश्ता है जिसमे पंडितजी को यकीन है की मेरी बात मेरा मेरा दोस्त नहीं काट सकता वो वादा मरने के बाद भी निभाएगा | जुबान की कीमत क्या है आखिर जो ताहिर फ़राज़ को कहना पड़ता है

“वो सर भी काट देता तो होता ना कुछ मलाल                                                                                अफ़सोस ये है उसने मेरी बात काट दी”

कहानी है वजीर की और ख़त्म होती है वजीर से, लेकिन प्यादे के साथ ये खेल का कौनसा नियम है जो उसे सिर्फ आगे चलने की इजाज़त देता है | अगर ऐसा है तो फिर ये खेल किस काम का ? लेकिन प्यादे की एक ताक़त है जो उसे वजीर बनाती है वो है चलते जाना | जिन्दगी की तरह ये खेल अजीब है जो खेल खेल गीत में बयां होता है कि “ चाल का ना कोई चाल चलन है , दोगलापन एक ही नियम है” |

AM तुराज़ का गीत फिल्म का सबसे अद्भूत, क्रांतिकारी और अदब का गीत है | शायरी की जादूगरी शब्दों में नशा भर देती है

“तेरे लिए मेरे यार ,ये जिन्दगी को निशार                                                                                    ये दोस्ती का क़र्ज़ है ,यही तो मेरा फ़र्ज़ है                                                                                   ख़ुद को मैं फ़ना करूँ तो हक तेरा अदा करूँ”

तो इस जिन्दगी की शतराज की बिसात पर वजीर दर्द,प्यार,दोस्ती ,हमसफ़र और बदले की कहानी हैं |

(निर्देशन बहुत ही लुभावना और तेज़ है पर पटकथा की कमजोरी कही ना कहीं साफ नज़र आती है | फिल्म के कुछ हिस्से फिल्म में ना होते तो फिल्म बेहतर होती | बच्चन साहब ना होते तो पंडितजी न होते और ना ही वजीर होती | फ़रहान सारे रंगों को बेहतरीन ढंग से निभा गए | आदिति के लिए जगह नहीं थी फिल्म में ज्यादा | मानव कौल ने फिर अपनी अदायगी का हुनर परदे पर छोड़ा है | छायांकन और साउंड फिल्म शानदार है कुछ गाने परदे पर दिल छु जाते हैं |)

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