द वायलिन प्लेयर – कला, कलाकार और जिन्दगी

वायलिन प्लेयर एक संघर्षशील कलाकार ,कलाकार और कला के रिश्ते, कलाकार के हालात पर एक अलग, अद्भूत और दिलचस्प कहानी है |

एक मध्यमवर्गीय किराए का घर, उड़ती मखियाँ, बेतरतीब वस्तुये, समेटा हुआ कचरा ,एक कप चाय और सुबह का अख़बार, अख़बार पड़ते ऋत्विक चक्रबर्ती और पीछे से घरेलु काम समटते हुए बतियाती उनकी बीबी नयनी दीक्षित | बीबी काम के लिए निकल जाती है और कलाकार अख़बार पढ़ता रहता हैं |

एक संघर्षशील कलाकार के पास फुरसती वक्त होता है | अख़बार के पन्ने रोज़ हाथो में होते है और तारीखे बदलती रहती है | जब हर रोज़ वहीँ जिन्दगी बार बार आँखों के सामने से गुजरती है तो कुछ जवाब मांगते सवाल पराजित होकर मौन धारण कर लेते हैं | इस मौन और कलाकार के ख़्वाब के बीच एक अपरिभाषित रिश्ता हो जाता है | मौन के टूटने की शर्त ख़्वाब का पूरा होना होता है, फ़िर दाख़िल होता है एक खामोश इंतजार |

चालीस कलाकारों का समूह , वायलिन की मधुर धुन , चौथी पंक्ति में ऋत्विक चक्रबर्ती , चेहरे पर ग्लानि और हताशा से उपजी अतृप्ति की मजबूर रेखाए | एक आर्टिस्ट कभी भीड़ का हिस्सा नहीं होना चाहता, भीड़ में व्यक्तिगत विचार कहीं दफ़न हो जाते है, उसी कब्र पर आर्टिस्ट अपनी आर्ट उकेरने का जब यत्न करता है तो एक दूरी उसे ख़ुद से बनानी पड़ती है | फिल्मो का मुख्य उद्देश्य होता है संचार/ संवाद | सबसे अच्छा संवाद वो होता है जहाँ बिना एक लफ्ज़ के बात दर्शक तक पहुँच जाये | बिन बातचीत के द्रश्य ख़त्म |

विज्ञान और कला के बीच क्या अंतर है ? सिर्फ़ किसी चीज़ की रचना करना आर्ट नहीं हो सकता | सर्जनता आर्ट से अलग है | कई आर्टिस्ट आर्ट के माध्यम से एक आदर्शलोक का गठन करने में लगे रहते है, तो कुछ हकीकत की परते उतारने में | मूल्यों को बदलने की कशिस जरुर महसूस की जाती रहीं है चाहे वो आधुनिक आर्ट हो या क्लासिक आर्ट | कला और विज्ञान के अध्यन से ज्ञात होता है कि एक वैज्ञानिक झूठ की परते हटाते हटाते सच तक पहुँचता है जबकि आर्टिस्ट झूठ सामने रखता है ताकि सच को पकड़ा जा सके | अशोक वाजपईजी ने भी कहाँ है कि कविता आधा सच है | आख़िर ये अधूरापन क्यों ? उनका मानना है कि आधा सच उस व्यक्ति के हाथो में है जो इसे पढ़ता है | पिकासो का कथन है कि एक पेंटर सूर्य को एक पीले निशान में बदल देता है पर कुछ लोग उस आर्ट के उसी निशान को सूर्य में बदल देते है |

पॉल डिराक के शब्दों में In science one tries to tell people, in such a way as to be understood by everyone, something that no one ever knew before. But in poetry, it’s the exact opposite.  अत: आर्ट हमेशा वो चीज़ कहती है जिसे सब जानते है |

मुंबई का लोकल रेलवे स्टेशन, ट्रेन का इंतज़ार करता वायलिन प्लेयर और एक अजनबी, अजनबी की निगाहें, अजीब सा खोफ़, नज़रअंदाज़ करने की कोशिश | भागने का नाकाम यत्न और एक नया ऑफर | आदिल हुसैन, एक सशक्त अभिनेता एक अज़ीब फ़िल्मकार के किरदार में | एक असफ़ल आर्टिस्ट या असफ़ल व्यक्ति आख़िर भागना क्यों चाहता है? वो कौनसा वक्त होता है जब पलायनवादी रवैया उसके रगों में घर कर लेता है | एक सफल व्यक्ति के ख़ुद से दूर से भागने में भी क्या यही संसार है या वो ख़ुद ?

एक असफ़ल आर्टिस्ट के अव्यावहारिक होने की वज़ह कहीं ना कहीं उसके जिन्दगी के साथ किये गए समझोते है | जब जब आदमी समझोता करता है वो ख़ुद को थोडा मार लेता है | हर समझोते के साथ साथ ख़ुद के वजूद का हिस्सा टूटकर बिखरने लगता है | धीरे धीरे वो इस तरह की बेबुनियादी,आत्मग्लानि की जिन्दगी से भागने लगता है | वहीँ कुछ लोग उसी तरह की जिन्दगी जीने लगते है और उसके आदि हो जाते है | इसी प्रक्रिया के तहत आदमी हालात के हाथो निगल लिया जाता है | जिन्दगी आखिर है क्या ? चकबस्त ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से कहाँ है

जिन्दगी क्या है अनासिर में जहूरे तरतीब।                                                                                                               मौत क्या है इन्हीं अजजां का परीशाँ होना।

मैं  एक टेक में पूरा म्यूजिक चाहता हूँ – आदिल हुसैन                                                                                                  एक टेक में ?- वायलिन प्लेयर                                                                                                                                    हां, मैं  शूट भी एक टेक में ही करता हूँ – आदिल हुसैन

वायलिन प्लेयर को पहली बार सोलो बजाने का मौका मिला वो भी 10 हज़ार की रकम के ऑफर के साथ | एक आर्टिस्ट ख़ुद को अभिव्यक्त करना चाहता है | एक आम आदमी गम को जितनी आसानी से पचा लेता है, ख़ुशी को पचाने में उतना ही कमज़ोर होता है | यहीं वज़ह है की नायक बार बार अपनी बीबी को कॉल करने का प्रयास कर रहा है लेकिन कोई जवाब नहीं | उसे चिंता भी है |

आख़िर अंत में एक आर्टिस्ट चाहता क्या है, अपनी जिन्दगी से ? ख़ुद से ?                    आर्ट का आदतों से क्या कोई सम्बन्ध है ? आर्टिस्ट की असली ख़ुशी अभिव्यक्ति के दायरे में ही सिमटकर रह जाना है या इस से परे भी कुछ है | अगर इस से परे कुछ है तो वो क्या है जो आर्टिस्ट को सकूं देता है | एक आर्ट से आर्टिस्ट का रिश्ता बस आर्टिस्ट ही समझ सकता है | किसी कविता के साये में कौनसा गम पला या कोई हसीन लम्हा दोहराया जाता है | वो कौनसे ख्याल रहते है जो कलम से बहकर कागज़ पर उतरते वक्त दिमाग में केमिकल लौचा करते है | पाब्लो के अनुसार किसी चीज़ की शुरुआत किसी चीज़ मिटाने से होती है |

कौन सी वज़ह होती है जिसके प्रभाव में उस्ताद जॉन एलिया ने ख़ुद को एक कमरे में समेटकर रख लिया था | फैज़ साहब क्या खुश हुए, जब इलाहाबद में उन्हें इतना प्यार मिला की अफ़सर, नेता और सारे प्रभावशाली व्यक्तिव उनके आवोभागत में थे ? क्या उस वक्त उन्हें टीस महसूस हुई जब महफ़िल में उनसे ज्यादा दाद जिगर मुरादाबादी ले गए ?  वो कौनसा पागलपन था जिसकी वज़ह से स्पीलबर्ग नकली कोट पहनकर नकली डायरेक्टर के भेष में स्टूडियो चले जाते है | ऑस्कर वाइल्ड कहते है कि इस दुनिया में केवल आर्ट ही गंभीर चीज़ है और मानवजाती में केवल आर्टिस्ट ही गंभीर नहीं है |

आर्टिस्ट की आदतों और उनके रहने के तोर-तरीको के बारे में हमेशा दिलचस्प बाते कहीं जाती रहीं है | ग़ालिब या मंटो का शराब पीने का शोक रहा हो या लेटकर लिखने की दोस्तोएव्स्की  की आदत | माना जाता है की आर्टिस्ट अपनी दुनिया में खो जाते है | रोहित पाटीदार का कहना है की वो दाढ़ी इसलिए रखता है क्योंकि उसे पसंद है ना कि इसलिए कि वो अलग दिखना चाहता है | सिगरेट या शराब ना पीने वाले आर्टिस्ट को हमेशा अलग नज़र से क्यों देखा जाता है ? आकांक्षा अनन्या का मानना है आर्टिस्ट का काम आर्ट को सहेजकर रखना है |

मैली कुचली गलियों से गुज़रते हुए दोनों सीढ़िया चढ़कर एक डरावने घर में पहुँचते हैं | बेतरतीब सामान, एक छोटा सा खुला रिकॉर्डिंग स्टूडियो , धूल भरे कपड़े और एक पानी की बोतल | अंदाज़ा लगाना नामुमकिन है की आख़िर ये फ़िल्मकार चाहता क्या है | एक कंप्यूटर जिसमे एक विडियो प्ले किया जाता है जिस विडियो को देखकर वायलिन प्ले करना है | वायलिन प्लेयर के हाथो का चलाने का ढंग, चेहरे पर गंभीरता का भाव, आदिल के संकेत और फिल्म का अपने अंतिम अध्याय में प्रवेश | एक मज़ेदार मोड़ के साथ फिल्म की भाषा पूरी तरह बदल जाती है | एक नई जुबान में आपसे बात करने लग जाती है फिल्म | आदिल और वायलिन प्लेयर के बीच आँखों से बातचीत , सांकेतिक भाषा का उपयोग और अनुपमेय अभिनय | लेकिन ये सब गैरवाजिब है जब तक फिल्म का उद्देश्य और निर्देशक कि सोच दर्शक तक ना पहुँच पाए | इसलिए अंतिम अध्याय मोक्ष जैसा है और यही फिल्म का आख़िरी द्रश्य है जिसमे वायलिन प्लेयर घर जाता है और तभी बुद्धिमान निर्देशक अपना अंतिम पत्ता फेकता है |

अंत में आर्टिस्ट का अंतर्द्वंद दिखाया गया है | पैराडॉक्स लिखने वालो ने हमेशा अंतर्द्वंद को रेखीय कोण के रूप में लिखा है, एक दुसरे के बिलकुल विरोधी | लेकिन वास्तव में कभी भी अंतर्द्वंद 180 कोण का हो ही नहीं सकता | डेविड एअगलेमन की इन्कोग्निटो द सीक्रेट लिव्स ऑफ़ ब्रेन में दिया गया है कि कैसे दिमाग छोटे छोटे हिस्सों में सोचता है और निर्णय लेता है | अंतर्द्वंद और द्वन्द में एक ये अंतर है और इसे समझना काफी समस्या का हल दे देता है | निर्देशक ये मानता है कि आर्ट आर्टिस्ट को अच्छा इन्सान बनाती है और यही फिल्म का अंतिम उद्देश्य भी है |

क्या वास्तव में कला इन्सान को अच्छा बनाती है ? काफी बड़े बड़े नाम है जिन्होंने आर्ट में तो शोहरत हासिल की लेकिन अच्छाई में उनपर सवाल उठते रहते है | वसीम बरेली साहब कहते है

मैं काफ़ी बड़े लोगो की निच्चाई से वाकिफ़ हूँ                                                                                                                    बहुत मुश्किल है बड़ा होकर बड़ा होना |

सवाल किया जाता रहा है की आर्टिस्ट के खुराफ़ाती दिमाग में इतनी चीज़े आतीकहाँ से है ? वो स्त्रोत आख़िर है क्या? एक आर्टिस्ट कहाँ से अपनी प्रेरणा लेता है ? किसी भी विचार का उद्गम स्थल क्या है ? और उसे मुकम्मल होने में क्या लगता है ? हम जो है वो हमारा दिमाग ही है | दिमाग से परे वास्तव में कुछ नहीं होता या होता है ये एक अलग बहस का विषय है | हमारे अन्दर जो भी है वो पांच इन्द्रियों के द्वारा हमें प्राप्त होता है | कुछ मान्यतावो में इन्द्रियों के विस्तार की बात की गई है | आर्टिस्ट किसी चीज़ की तलाश में होते है और वो तलाश वो आर्ट के द्वारा पूर्ण करना चाहते है | खोजने की प्रक्रिया आत्मीयता से जोड़ती है |

आर्टिस्ट का खून से क्या रिश्ता होता है ? प्योर ब्लड की धारणा के पक्ष वाले अपने नजदीकी रिश्तेदारों में ही शादियाँ करते थे ताकि खून अशुद्ध ना हो | वर्तमान फ़िल्मी गीतकारो की बात करे तो जावेद साहब और गुलज़ार साहब शीर्ष पर है | जावेद साहेब बचपन से जिस माहौल में रहे वो उनकी परिचर्चा में साफ़ नज़र आता है | वाकचातुर्य में वो बहुत आगे है, वहीँ दूसरी और गुलज़ार में मासूमियत, रूमानियत भरी पड़ी है | वो नज्मो को लेकर घंटो बात कर सकते है | रविन्द्र कालिया के साहित्य के पीछे राकेश मोहन का सानिध्य क्या महत्व रखता है ? खैर दुनिया की नजरो में आर्ट की क़ीमत है प्रक्रिया की शायद उतनी नहीं | शम्स देवबंदी एक शेर है कि

जब तलक शीशा रहा मैं बार बार तोड़ा गया,                                                                                                                   बन गया पत्थर तो सबने देवता माना मुझे |

 

 

 

 

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