मुंबई और दोस्ती

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5 दिन 25 फिल्मो के गंभीर, निरंतर, सार्थक और अनूठे मामी फिल्म फेस्टिवल के सफ़र के बाद सोचा क्यों ना शहर को थोडा देख लिया जाये | मैं मुंबई से थोडा वाकिफ़ हूँ, लेकिन रोहित इस शहर में पहली बार आया था | इन कुछ दिनों में चंद चीजे तो वो जान ही गया, पहली लोकल ट्रेन का सफ़र और दूसरी पाव (वडा पाव ) का महत्व | हमें लगने लगा कि अगर इस शहर में कहीं पोहे की चर्चित दुकान होगी तो वहां पोहा नहीं, ‘पाव पोहा’ मिलता होगा |

रोहित को अगर आप सुबह दस बजे से पहले उठा हुआ पायें तो उसकी बस तीन वजह हो सकती है | या तो अपना दैनिक क्रियाकलाप या वो रात से ही सोया नहीं है या उस दिन फिल्म की शूटिंग हो | आप इसकी शक्ल पर मत जाइये | वो  बेहद मासूम, गंभीर और व्यावहारिक है | अगर आप इसे देखकर अंदाज़ा लगाये की ये नशे में है या इसे सिगरेट की लत है तो माफ़ कीजियेगा आप गलत हैं |

रोहित और मैं उस निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आते है जहाँ छः हज़ार की TV भी किस्तों पर ली जाती है | हमारे घर का हर सदस्य कार लेने का ख्वाब तो देखता है लेकिन हकीकत में उनकी मोटरसाइकिल भी हमेशा रिज़र्व में चलती हैं |

खैर हमारे पास सिर्फ़ एक दिन था | रोहित चाहता था कि एक  बार वो समन्दर के किनारे  खड़े  होकर बस  ये कह पाए कि एक दिन मैं  इस  शहर पर राज़ करूँगा | समंदर हमसे  दो किलोमीटर की दूरी पर था पर हमें कुछ  किताबे क्रय करनी थी | नेट पर  कहीं पढ़ा  था की चर्चगेट के पास किताबे बहुत सस्ती मिलती है | वैसे  वहाँ  हमें निराशा  ही हाथ लगी क्योंकि हिंदी की तो क़िताबे नाममात्र थी और जो दूसरा साहित्य हमने निकाला था वो भी  वापस रखना पड़ा क्योंकि क़ीमत हमारी सोच की क़ीमत से बाहर थी | इंदौर में रेलवे स्टेशन के पास वाला उस से सस्ती किताबे देता है | हम बस १२ किताबे ले पाये |

कुछ  ही दुरी पर फैशन स्ट्रीट मार्केट था | जब हमें विंडो शोपिंग भी वहाँ महंगी लगी तो अहसास हुआ कुछ वर्ष नोकरी कर लेना चाहिए | अश्वनी को जैसे ही पता चला हम मुंबई में है उसने कहाँ भाई मिल के जाना | वो पुणे में रहता है और रोहित का कॉलेज फ्रेंड है | अश्वनी अपने आप में एक अद्भूत एवं अनुपमेय शख्स है | किसी एक मामले में भगवान लगता है उस पर मेहरबान है तो दूसरी तरफ़ ठीक उसका उलट | रोहित ने कहा मामा( इसकी वज़ह दूसरी है, इस तरह का कोई रिश्ता नहीं है हमारा ) जाना पड़ेगा, हम उसे मना नहीं कर सकते | मैंने पूछा फिर मुंबई, कहता है फिर कभी | हम मुंबई से पुणे की ट्रेन में बैठ गए | मैं थक गया था और नींद आ रही थी बहुत | जाने क्यों, रह रह कर निर्मल वर्मा की टीन का छत याद आ रही थी | ट्रेन चल दी, मैं आँखे मल कर मुंबई को देख रहा था और मुंबई आँखे फाड़कर रोहित को |

वैसे अभी के हम दोनो के हालात पर तो उस्ताद जौन का एक शेर याद आ रहा है

“हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद                                                                                                                        देखने वाले हाथ मलते है |”  

( रोहित और अश्विन फ़ोटो मैं)                                                    

 

 

 

 

 

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