अलीगढ़

क्या प्यार को परिभाषित किया जा सकता है? इश्क का क्या कोई दायरा नहीं होना चाहिये | अगर आसमां ही सिमट जाये तो सूरज कहाँ से निकलेगा और फ़िर उजाले की कीमत क्या होगी ? मौत,विकल्प में ही क्यों होती है मेरे यार सिरास ?

स्थिर कैमरा, एक दो मंजिला मकान, प्रोफ़ेसर सिरास (मनोज वाजपई ),एक खामोश साइकल रिक्शा वाला, सिरास के हाथो में बेग, आँखे अंदर धंसती हुई उम्र और अनुभव की गवाह, अँधेरे की आगोश में रात और रात का सन्नाटा, सन्नाटे में रिक्शा चलने की आवाज़ और एक गुनगुनाती हुई राग – दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा, तू हमसे आँख ना चुरा, तुझे कसम है आ भी जा |

सिरास के घर का कमरा, बार बार बंद चालू हो रही है, आवाज़ नहीं, कैमरा अब भी स्थिर, कानाफूसी की आहट, एक अहसास, परदे के भीतर इश्क पर परदे पर बस मकान की दीवारे | तुमसे मेरी जिन्दगी का ये सिंगार है, जी रहीं हूँ मैं कि मुझको तुमसे प्यार है | प्यार को परदे या दीवारों की जरुरत क्यों होती है?

दो नए लोग, हाथो में कैमरा और दिल में एक साजिश | दोनों कमरे में दाखिल होते है जहाँ रिक्शा वाला और प्रोफ़ेसर सिरास है | कैमरा अब भी वहीँ स्थिर | कानाफूसी की आवाज़ बदल कर प्रबल हो गई | परदे के बाहर और परदे के भीतर क्या अंतर होता है, जब सब कुछ वहीँ है तो फिर चीजे क्यों बदल जाती है |

भारत में तीसरे नंबर पर काबिज़ अलीगड़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नियम के अनुसार सिरास को इस तरह के गैर मानवीय आचरण के लिए निष्कासित कर दिया जाता है | अखबारों को पेट पालने के लिए खबर मिल जाती है | आख़िर कब तक मसालों के सहारे दाल गलती रहेगी | भारतीय पत्रकारिता अपने उस मुकाम पर है जहाँ खबर दिखाई नहीं बनाई जाती है |

एक युवा पत्रकार दीपू (राजकुमार राव ) का नजरिया ये है की आख़िर बिना अनुमति के कैमरा लेके सिरास के निजी जीवन में दाखिल होना क्या मानव अधिकारों के खिलाफ नहीं है ? क्या ये निजता का उलंघन नहीं है? किस तरह कॉलेज की राजनीति एक बदसूरत शक्ल में सिरास के कमरे में दाखिला हो जाती है |

फिल्म कई सवाल उठाती है | गे होने के कारण उनके कमरे की बिज़ली काट दी जाती है | प्रोफ़ेसर सिरास एक सामान्य व्यक्ति है वो गैर क़ानूनी तरीके से बिजली के तार जोड़ लेते है | उनमे भी वो सारे मानवीय दोष और सारे अहसास के जो किसी भी इन्शान में होते है | उन्हें अपना कमरा ख़ाली करना पड़ता है | मकान मालिक से बहस में सिरास कहते है कि क्या बैचलर आदमी टेरिरिस्ट होता है ? वास्तव में वो कहना चाहते है कि क्या गे होना गुनाह है |

एक तीन मिनट का विलक्षण द्रश्य जिसमे सिरास शराब पीते पीते गुनगुनाते है और गाना चलता है, आपकी नज़रो ने समझा प्यार के काबिल मुझे | उनके पांव उसी धुन में हिलते रहते है | उनका अंदाज़, हाथों की हलचल , और कहीं अलग दुनिया में चले जाना, लता दीदी की आवाज़…”आपकी मंजिल हूँ मैं,मेरी मंजिल आप है” , और अगली पंक्ति में आँखों में एक अजीब चमक…:क्यों मैं तूफान से डरु, मेरा साहिल आप है” और आख़िर में पूर्णता की तलाश ..”कोई तुफानो से कह दे मिल गया साहिल मुझे”

मनोज वाजपई ने सिरास को अपने अंदर इस कदर उतार लिया है की आप मनोज को भूल जायेंगे | सिरास के साथ जब दीपू सेल्फी लेता है तो सिरास शरमा जाते है | कुछ गे व्यक्तियों को नाचता हुआ देखकर उनके होठो पर दबी दबी मुस्कराहट आ जाती है और वो अपना सर नीचे कर, नज़रे छुपाकर परमानंद को महसूस करते है | ये ख़ामोशी, ये हसी. ये अदाये, ये अंदाज़ हकीकत इतनी खूबसूरत है तो फिर इसे बदसूरत क्यों कहा जाये |

कंधे पीछे की और झुके हुए, आँखे चुराकर देखने का अंदाज़, कोर्ट की प्रक्रिया को दौरान सो जाना या फिर अपनी कवितावो का अनुवाद करना, बोलने का एक अद्वितीय तरीका और मन के अवसाद पर मरहम लगाते गाने …”बेताब दिल की तमन्ना यहीं है..चलो दुनिया नै बसायेंगे” |

राजकुमार अपने ऑफिस की एडिटर के साथ और उसी वक्त मनोज, रिक्शा वाले के साथ | एक सीन जो सारे सवाल समाज के सामने उठाता है | दुनिया के रिवाज़, समाज के दायरे, बेवजह के वसूलो के परे क्या है | चीज़े सिर्फ इसलिए बदल जाती है क्योंकि एक तरफ लड़का है और दूसरी तरफ लड़की | पूरी फिल्म का निचोड़ ये सीन… जो आपको कहेगा होने दो जो हो रहा है, , मत रोको , बहने दो, घुटन से बाहर आओ, सांस लेने दो, उड़ने दो..इनके परो पर किसी लिंग की छुरी मत रखो इन्हे भी आसमान दो | रूमी के शब्दों में

“Out beyond ideas of wrongdoing
And right doing there is a field.
I’ll meet you there.

नेतिकता के नाम पर निजता का हनन हो रहा है | नेतिकता की परिभाषा सबकी अपनी अपनी है | शाकाहारी के लिए मासाहारी भी अनेतिक हो जाता है | क्या रिश्ते को सिर्फ सेक्स के नजरिये से देखा जाना चाहिये | अगर आप पेनिट्रेसन के तरीके से देखेंगे तो फिर तो बहुतायत में आपको गे मिल जायेंगे |

फिल्म गे के बारे में कम, अधिकारों और मानवीय संवेदना के बारे में अधिक है | एक व्यक्ति के अहसास की कहानी, उसके अकेलेपन की दास्ताँ ,जो सवाल उठाता है की आप किसी की फीलिंग को तीन अक्षरों में कैसे समझ सकता है?कोई प्यार को समझने की कोशिश क्यों नहीं करता? वो कहते है की कविता शब्दों में नहीं शब्दों के बीच में मौजूद ख़ाली जगह में होती है | उनकी सोच के स्तर और मानवीयता का अंदाज़ा उनकी कविता से लगाया जा सकता है..

“o beloved moon
Fear not the dawn
That separates us
We will meet again
When the world goes to sleep”

सिरास की मौत कैसे हुई इस पर कई असमंजस है पर फिल्म देखकर ये बात साफ़ हो जाती है कि उन तमाम लोगो ने मिलकर उसका क़त्ल किया है जिन्होंने ऐसा समाज बनाया जहाँ सिरास जैसे निष्कपट लोग साँस नहीं ले पा रहे है | मसरूर जालंधरी का एक शेर है

“क्यों हमको सुनाते हो जहन्नम के फ़साने
इस दौर में जीने की सजा कम तो नहीं है” |

(मनोज का अभिनय सदी के सबसे अच्छे अभिनय में गिना जायेगा | जो भी फिल्म देखेगा उसके लिए सिरास को भूल पाना असंभव है | फिल्म की ताक़त अनुपमेय अभिनय के अलावा फिल्म के एडिटर और पटकथा लेखक Apurva Asrani है |फिल्म में किसी प्रकार का मेलोड्रामा नहीं है और ये साहस तारीफ से परे है|निर्देशक कही भी फिल्म को कमजोर नहीं होने देते है |)

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