फ़सादत के अफ़साने

फ़सादत के अफ़साने, जुबैर रज़वी द्वारा सम्पादित हिन्दुस्तान के फसादात के अफ़सानों का संग्रह है | फ़सादत के किस्सों पर अब तक संसद से लेकर सड़को पर बाते होती रहती है | आला दर्जे के अधिकारियो ने अपनी अपनी रिपोर्ट पेश की, पत्रकारों ने टीवी से लेकर अखबारों के पन्नो तक दस्तक दी | आंसुओं को बेचने का यत्न किया गया तो वहीँ चुनाव जितने का हथियार भी इसे बनाया गया | मौत को दर्द को आंकड़ो में पिरोकर छोड़ दिया गया |

अफ्सानानिगारो ने जो अफ़साने लिखे है उन्हें पढ़कर जो फ़सादत के असली चेहरे, खुनी आग की साजिश, परदे के भीतर की कहानी और अपरिभाषित दर्द का अहसास का पता चलता है वो लाख रिपोर्ट पढने पर भी समझ नहीं आता |

१९४७,१९९२,२००२,१९८४ केवल नाम बदले गए बाक़ी खून का रंग, जज़्बात के मायने ,दर्द से कराहती आँखे, नितांत पैदा हुई ख़लिश वही रही | अफसानानिगार की तखलीक तमाम काले किस्सों पर सफ़ेद बात कहती है | कई तारीखे आज भी लाखो लोगो का तआकुब करती है और उस से भाग पाना नामुमकिन है | शासन चाहे जितनी वजाहत दे पर उनके गैरजिम्मेदाराना रवैये से जनता वाकिब हो चुकी है |

जो मरासिम था फसादात से पहले हिन्दू मुसलमान या सिखों में उसके मायने आज कैसे बदल गए है | एक डर लाखो लोगो के वजूद का हिस्सा बन चूका है और इस डर की जड़े शासन की नाकामियों के खाद के बदोलत कट्टरता वाद में अपने पाँव जमा चुकी है |

सबसे पहला अफसाना है उर्दू अदब के एक सबसे बड़े अफसानानिगार मंटो की कहानी खोल दो से | खोल दो उर्दू इतिहास की सबसे चर्चित कहानियों में से एक है | कहानी जब ख़त्म होती है तो आप हिल जाते है | मंटो पर भारत पाक विभाजन का गहरा असर था | ये अफ़साना तलब करता है की एक कोम दुसरे कोम की दुश्मन नहीं होती | असल में दुश्मन होते है वो लोग जिनके जेहन में इन्शानियत मर चुकी है | वो लोग जो केवल और केवल फ़ायदा उठाना जानते है |

काली रात,शुक्रगुजार आँखे, अमृतसर आजादी के पहले और आजादी के बाद, जड़े आपका वास्ता हकीकत से करवाएगी | परमेश्वर सिंह एक ऐसा अफसाना है जो दर्द को मानवीय रिस्तो में समझाता है | यहाँ बदला नहीं मोहब्बत है | इन्शानियत है | क्या पगड़ी एक मुसलमान को सिख बना देती है | अख्तर और करतारा में क्या फर्क है ? अगर है तो फिर क्यों दोनों एक से लगते है | टेबिल लैंड में दुखी दीनानाथ एक अफज़ल नाम के शख्स की इमदाद करता है क्योंकि दर्द का कोई महज़ब नहीं होता | राजेंद्र सिंह बेदी की चर्चित कहानी लाजवन्ती इस बात की दास्तान है कि कैसे एक औरत की जिन्दगी किसी बेरहम वक्त की वजह से वस्ल में भी हिज्र से बदतर हो जाती है |

आजादी के बाद के फ़सादत पर नीव की ईट, नीला खौफ़ , गुलज़ार साहब की खौफ़ आदि रचनाये है | सिकंदाबाद जहाजी का सफरनामा में एक बन्दा फ़साद देखने के लिए हिन्दुस्तान आता है और उसके लिए विशेष फ़साद आयोजित किया जाता है |

हालिया फ़साद पर समूएल अहमद की रचना आपको चोका देगी | अफ़साने की पहली पंक्ति पर एक नज़र

“दंगे में रंडियां भी लूटी गई थी……”

एक वेश्या के घर से लूटा गया सिंगारदान क्या कोलाहल करता है? कैसे आदमी की आदमियत बदल जाती है |

या खुदा, (उल्लाह शहाब) में एक औरत जो एक दिन पहले माँ बनी है उसका किस्सा है | उसके स्तनों को देखकर उसी कोम के दो नोजवानो को पता चलता है कि वो अभी अभी माँ बनी है तो क्या होगा ? क्या मुहाजिरो की गिनती कभी किसी देश में की जाएगी | मुहाजिरो को कैसे वासना की आग में झोका गया | उसके अफजलतर कौन होगा जो हालत के मारे लोगो को मारने में लगा है |

( ये किताब अगर ना पढ़ी हो तो अवश्य पढ़े | ये तखलीके तकरीब से बचाएगी | आज के माहौल के हिसाब से भी ये बहुत जरुरी हो गया है की बचे हुए लिबास को बचाया जाये वर्ना ये दुनिया नंगी हो जायेगी )

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