चार्ली

चार्ली चेप्लिन – ( जन्म -16 अप्रैल 1889)

तुझे देखता हूँ चार्ली तो
मुह मोड़ लेता हूँ |
क्या तुम अब भी हंसते हो ?

चम्मच से कपड़ो पर गिरे निवाले से
अब किसी की हंसी नहीं फूटती |
वो असभ्यता का परिचायक हो गया है
इस सिविलाइज्ड सोसाइटी में |

जो फफक कर आ पड़ती थी
अब आँखों में अटक गई है |
किसी की श्रेष्ठता को कर रही है परिभाषित
किसी को दुर्बल बनाते हुए |

कहीं कोई ठहाका लगता है तो
सहम जाता हूँ मैं
दबी दबी हंसी हँसता है कोई
तभी परस्पर एक सिसकी जन्म लेती है |

अब मेरी अंग्रेजी पर
वैसे नहीं हंसते लोग
जैसे हसते थे बचपन में
के फॉर कैट कहने पर |

बेमाप साहस था कि खुद बनते थे हसी की वजह
जख्म आँख मिलाने से कतराते थे |
आज चार्ली, सर्कस में जोकर नहीं होता
देखो दुनिया,फिर करो हंसने का साहस |

बस करो, मैं नहीं देख सकता ये दुनिया
आई ऐम फीलिंग ओफ्फेनडेड नाउ
अरे चार्ली सुनो तो
क्या तुम अब भी हंसते हो ?

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