नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

एक तरफ दिवाली का मिलन सामारोह अपनी पुरजोर सव़ाब पर था वहीँ दूसरी ओर किसान गाय,भेंस को मेहंदी करने में लगे थे | खेतो पर जानवरों के सिंग रंगे जा रहे थे | लोगो की चाय की चुसकिया ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी | मैं ललित और मोहन एक मीटिंग ख़त्म कर गाँव के पुराने हॉस्पिटल के पास पहुंचे | पहली नज़र में वहां का नजारा देख मेरी आँखों में ठीक वैसी ही सुखद अनुभूति थी जो मंदिर के सामने एक घूम हुई चप्पल मिल जाने पर होती है |

पुराना हॉस्पिटल,जब से नया हॉस्पिटल खुला है कुछ लोगो के शराब पीने का अड्डा, कुछ लोगो के लिए कचरा घर बन गया था | नए के वजूद में पुराने को नजरांदाज करने की फ़ितरत काफ़ी चीज़े बिना कुछ कहे छीन लेती है | ये बात वो अच्छी तरह समझ सकता है जिसे दो बार इश्क़ हुआ है | क्योंकि “राते और भी है वस्ल की रातो के सिवा” ( फैज़ साहब ) |

कुछ युवा अपने दिवाली के कपडे बदल कर हाथ में फावड़ा, तगारी ओर कुल्हाड़ी लिए हमारे साथ हॉस्पिटल में प्रवेश कर चुके थे | धीरे धीरे सफाई अभियान में 40 से ज्यादा युवा शामिल हो गए | कुछ ऐसे लोग भी जिन्होंने जिन्दगी में कभी घाँस नहीं काटी | “मेरा गाँव मेरी दुनिया” के इस प्रोग्राम को देखकर गाँव वाले दंग रह गए | गाँव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बिना किसी राजनितिक पार्टी और स्वार्थ के लोगो ने ऐसे काम को अंजाम दिया | देखते ही देखते पूरा हॉस्पिटल साफ़ हो गया |

“मेरा गाँव मेरी दुनिया” ने उस हॉस्पिटल के कुछ कमरों को पुतवाकर और साफ़ करवाकर वहां एक पुस्तकालय सेट किया | टीम और अन्य सदस्य की सहायता से अब फ्री नवोदय विद्यालय की तैयारी कराई जाने लगी है | गाँव वालो का उत्साह देखकर भविष्य में विभिन्न प्रोग्राम की नीव रखने की भी कमर कस ली गई है |

दिल्ली में एम्बियंस माल के नीचे खड़े एक हाथ में सिगरेट लिए जब लड़की कहती है आई कांट टोलरेट हिम जस्ट फक्ड और मध्यप्रदेश के किसी गाँव वाले पर टिपण्णी करते हुए कहते है कि जनता ही मुर्ख है परिवर्तन कैसे आ सकता है? कितना आसान लगता है एसी मैं खड़े रहकर दोष रोपना लेकिन कभी कल्पना करो उस लड़की की जिसे संस्कार और अधिकार में फर्क ही पता नहीं | जहाँ लडको से हाथ मिलाना भी शक की नज़र से देखा जा सकता है | उस लड़के से जाकर मिलो कभी जो रात में खेत में सिचाई करता है, डॉक्टर बनने के ख्वाब देखता है पर उसे पता ही नहीं की एंट्रेंस एजाम क्या होती है और क्या क्या आता है |

इसमे कोई दोराय नहीं की वो बदलाव मुश्किल है लेकिन यही बदलाव सबसे ज्यादा जरुरी है | गाँव के विकाश के बिना देश के विकाश का स्वप्न देखना मुर्खता है | मेरे गाँव से ही लोग जयपुर जोधपुर काम करने के लिए पलायन करते है कोई जयपुर, दिल्ली से मेरे गाँव में काम करने नही आता | धारणीय विकाश की तर्ज पर कैसे गाँव को सम्रध किया जा सक्ताब है ?
बेंगलौर के बड़े बड़े आईटी कैम्पस में बैठे गाँव के सोफ्टवेअर इंजिनियर कितनी मर्तबा गाँव लौटने की ख्वाहिश प्रोग्राम कर कर ख़त्म कर देते है |
मेरा गाँव मेरी दुनिया एक सोच है युवाओं को गाँव के विकाश में भागीदारी बनाने की, उन्हें मुख्य धारा में जोड़ने की | मेरे गाँव की हालात के लिए मैं भी जिम्मेदार हूँ |
निदा फाजली का एक शेर याद आ रहा है

“सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती है निगाहें
क्या बात है मैं वक्त पर घर पर नहीं जाता”

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