अनारकली ऑफ़ आरा – आइस पाइस

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा |

दुष्यंत का ये शेर मसान की शुरुआत में आये चकबस्त के शेर के पास ना चाहते हुए भी खींच ले जाता है | “हमको देखे सुरती फांके, चोर नज़र से लहंगा झांके” के साथ रंगीला डांस की प्रस्तुति |

स्टेज पर आप डांसर के साथ मासूम बच्ची को देख रहें होते है उसकी आँखे आपको आकर्षित करे तो इसमे कोई अलग बात नहीं है | उसकी आँखे और तमाम दर्शक की आँखों में केवल एक हकीकत का अंतर है | फिल्म का ये क्षणिक द्रश्य तीन हिस्सों में स्वत: बंट जाता है, एक नाचती नर्तकी, दूसरा उसके पीछे बैठे लोग और तीसरा उसे देखते दर्शक | “सरक सरक सरकाईले कि लहंगा मारेला जोर” उत्तेजना की उपज लापरवाही और लापरवाही की बंदूक की आवाज़ | जब कोई आवाज जोर से होती है तो काफी कुछ शांत हो जाता है |

दृश्य बदलता है क्योंकि चंद आँखे बदलती है लेकिन फिर से वहीँ परिस्थिति | वो मासूम लड़की जिसकी आँखे आपको आकर्षित कर रही थी पान चबाते हुए आती है और अब उसकी आइडेंटिटी है देसी तंदूर विदेशी ओवन अनारकली ऑफ़ आरा |

“कस के उधेडता है, कुछ तो रगड़ता है, दुखता है चुभता है, धीरे से घुसता है कानो में कह के कविता” | स्वरा भास्कर आपकी आँखों से अब लगभग गायब हो चुकी है और जो हकीकत का पाटा उस बच्ची और दर्शक के बीच था वो ढह चूका है अब आपके सामने जो है वो है अनारकली आफ आरा | अगर मैं इस वक़्त आरा में होता तो ये सांग्स सुनने जरुर दर्शको के बीच बैठा होता | “ ऐ सखी तू अरे ना सखी टिका” | पंकज त्रिपाठी रंगीला को अपने रंग में रंग चुके है | वो आपको चंद सेकंड का समय नहीं देते कि आप नील बट्टे सन्नाटा के टीचर या गेंग्स आफ वासेपुर के सुल्तान के तनिक भी नजदीक जाये | रंगीला इस टोली के प्रोग्राम करता है और वो वास्तविक मानवीय प्रेम, अप्रेम, हकीकत, ओकात से जुड़ा साधारण इंसान है | वो दोष को समय की रूप रेखा में देखता है अत: वो नायक नहीं है | इस फिल्म की नायक है अनारकली |

वीसी शुक्ला ( संजय मिश्रा ) अनारकली के एक प्रोग्राम में आते है | संजय मिश्रा एक जादुई एक्टर है उन्हें किसी भी सांचे में डालकर सांचा लाइट केमरा एक्शन के साथ खोल सकते है | वीसी शुक्ला तथाकथित कवि और एक यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर है | उन पर सीएम का हाथ होता है जो आज की राजनीति का विश्वविद्यालयों में दाखिल हो जाने की तरफ भी इशारा करता है | वीसी की चाटुकारिता, वीसी का दस हज़ार ईनाम देना, जुगाड़ की बोतल में शराब पीना और अनारकली की थिरकन के साथ “ऐ जरा घिस ले, तनिक रगड़ ले, ऐ दरोगा दुनलिया में जंग लागा हो” | वीसी पर अपनी पोजीशन और नशे का नशा स्टेज के ऊपर पहुंचा देता है जहाँ कामवासना अपना रंग दिखाती है और फिर अमुक साधारण दर्शक, विवश रंगीला | “महफ़िल से लई जा उड़ई के मुझे, घूंट घूंट मुझको गटक जा रे | अति की अति नहीं हो सकती एक जोरदार तमाचा | दृश्य का बदलना स्वाभाविक |

अनारकली का रिपोर्ट लिखवाना, आम आदमी की बात को नजरअंदाज करना और उसके सबूत को ख़त्म करना | खैर समेटना तो यहाँ भी जायज नहीं | पुलिस, राजनीति जिसे लगती है तो साढ़े साती के लगे शनि से भी ज्यादा घातक होती है | अनारकली का ये स्वीकारना कि अलग होता तो कोई बात नहीं थी हम हेंडल कर लेते | हम कोई पवित्र नहीं है लेकिन सबके सामने | फिल्म फिर मानवीय मुद्दों को इस डायलाग से रूबरू करवा देती है | ये जो पब्लिक इमेज है वो पर्सनल इमेज कतई नहीं है | पब्लिक इमेज को हर वर्ग का आदमी दुरस्त चाहता है और इसमे कोई बुराई नहीं लेकिन प्रॉब्लम ये है कि क्या वो सच है ? गर ये सच नहीं तो ये नाटक गंभीर है और ये अपने तरीके से समाज को कुतरता है | हम सब खुद को कुतर रहे है |

अनारकली का अपने साथी के साथ दिल्ली पहुंचना और हीरामन उर्फ़ हैरी मैन (इश्तियाक खान ) से मिलना फिल्म में नया आयाम रचता है जहाँ संभावनाए दिखाई देती है | उम्मीद आदमी को कंधा देती है और इसका ताल्लुक उसके रीढ़ की हड्डी से बिल्कुल नहीं है | रीढ़ की हड्डी जमीनी हकीकत है जिसे आप नजरअंदाज कर सकते हो लेकिन नकार नहीं सकते | हाँ अगर आप उसे स्वीकार ले तो उसकी मजबूती पर ध्यान दिया जा सकता है |

हीरामन वो व्यक्ति है जिसके लिए देश आरा है और कहीं ना कहीं मिटटी की खुशबू उसकी ऊपर वाली जेब से टपकती रहती है | हीरामन बैंगलोर, पुणे में काम कर रहे वो तमाम सोफ्टवेअर इंजिनियर हो सकते है जिन्हें केवल दिवाली होली नहीं बल्कि गाँव के पेड़ पर लगे बेर का स्वाद भी बुलाता है और याद आता है | इनका एक तकियाकलाम है कि “मेरे लिए ना सही देश के लिए” | जब वो थंब्स अप का साइन देते है तो लगता है कोई अपना है | मुलाकात की इब्दिता में जो पाँव छूता है वो अंत में अपने हाथ अनारकली के सर पर रख देता है | बिछड़ना मिलने की प्री क्रिया है | फिल्म के निर्देशक अविनाश दास उनसे बार-बार कहते शूट पर कहते थे ‘इश्तियाक़ यह किरदार मेरी आत्मा है। इसमें नकली कुछ मत करना।

एक दृश्य में वीसी के पास एक औरत और एक आदमी संस्कृत के प्रोफ़ेसर के नोकरी के लिए आते है | चंद दृश्य बाद वीसी को फिर उसके साथ दिखाया जाता है जो स्पष्ट था | दृश्य को रचने के लिए उसके प्री दृश्य को रचना पड़ता है | ये औरत उस मानसिकता की परिचायक है जहाँ सब कुछ घर की सहमती से चलता है और औरत को इस बात की आज़ादी दे दी जाती है कि वो अपने जिस्म का फ़ायदा उठाकर कुछ पायें |

अनारकली वापस आरा में होती है, ये घर वापसी एक रिवेंज है जहाँ दुनिया से भागना खुद से भागना होता है | जिस मानसिकता के लिए अनारकली का वीसी से द्वंद्व होता है उसकी मानसिकता का फ़ायदा उठाकर वो बरी हो जाती है | ये दुनिया एक महाभारत है यहाँ सारे दांव जायज होते है | यहीं ये फिल्म पिंक से जुदा है और इसकी तुलना पिंक से करना एक भूल नहीं मुर्खता है |

एक बायसनेस की बात की गई है कि हम गाने वाले लोग है तो कोई आसानी से बजा भी देगा | वहीँ फिल्म के एक सीन में किसी के बुलावे पर अनारकली की मम्मी को उठकर जाते हुए दिखाया गया है | फिर से स्टेज सजता है फिर अनारकली की आवाज गूंजती है | ये फिर से एक दोहराव नहीं है, ये पुनरावृति नहीं है | क्योंकि सच को मोबाइल से डिलीट नहीं किया जा सकता, वो एक दिन अपना मुँह उठाकर चला आता है | अत: आईना सामने होता है जिसे ठुकराने का वक्त वीसी के पास नहीं होता |

“रंडी, रंडी से कम या तुम्हारी बीबी को आइंदा छूने से पहले पूछ लेना” | फिल्म के अंतिम दृश्य में अनारकली एक शेडो लाइट से बाहर निकती है और म्यूजिक उसकी चाल के साथ बदल जाता है | बदलना नियति है लेकिन क्या बदलना है ये नियति तय नहीं करती |

खैर हालत तो

हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ए-ना-गहानी और है |

कौनसा छूना सही है कौनसा गलत इसका हक हर जिस्म के मालिक को है | नीयत की भी अपनी सीमा रेखा है और अतिरेक में शामिल हर चीज़ को नकार देना चाहिए | सही नीयत से छुआ गया गलत है गर वो जिस्म के हक़दार की नज़र में गलत है | एक महीन रेखा कई दफ़ा आपसी रिश्तों में भी टूट जाती है | पति- पत्नी, दोस्त, गर्ल फ्रेंड चाहे जो हो बेहद जरुरी है आपसी रिश्ते में एक्स्प्लीसिट बात |
मुझे अमिताव घोष की शैडो लाइन्स की में याद आती है जिसके साथ नायक थोड़ा आपत्ति वाला कृत्य कर बैठता है और वह। उस से कहती है कि तुम सुबह खुद पछ्तावोगे | खैर उनकी दोस्ती पर कोई असर नहीं पड़ता |

जहाँ तक जिस्म की निजता की बात है तो कुछ लोग ( मेल, फीमेल ) जिस्म का फ़ायदा उठाना बंद करे वर्ना हर फायदा कहीं ना कहीं एक बायसनेस को जन्म देगा | दोनों हाथो से ताली बजाकर इसे बंद किया जाना चाहिए |

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