ग्राम्य मंथन – नेपथ्य में संभावना है 

शकील बदायुनी का एक शेर है

“मुझे आ गया यक़ीं सा कि यही है मेरी मंज़िल
सर-ए-राह जब किसी ने मुझे दफ़अतन पुकारा”

ग्राम्य मंथन, वह जगह जो गुजिस्ता कुछ महीनो से जेहन में बस सी गई थी और दफअतन पुकार रही थी | मैं फ़िर से गुनगुनाना चाहता था “झूठा माई थारो बाप, झूठा सकल परिवार, झूठा कूटता छाती” मैं मेरी बेसुरी आवाज़ में गाना चाहता था “किसी की मुस्कुराहट पर हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, जीना इसी का नाम है” | मैं चाहता था कि मुझे तन्मयता से बिना गीता पर हाथ रखे सुना जाए | मैं देखूं तो परिवर्तन देखूं, मैं महसूस करू तो हो समानुभूति, मैं अगर कान दूँ तो जजमेंट से परे हो, मेरे अतिरेक में भी हिचकिचाहट का घर न हो|

तो जनाब हम अवध एक्सप्रेस के ज़नरल डिब्बे में सवार, पहुच गए 748 किलोमीटर दूर कानपुर सेंटल | घर से दूर एक घर होना इस बात का साक्ष्य है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संभावना अभी शेष है | प्रखर भैया के घर में आ बसे टीम के ग्यारह सदस्य उसे एक ऑफिस में तब्दील कर देते है | फ़िर शुरू होती है वो प्रक्रिया जिसका हिस्सा भारत से आये दो दर्जन लोग बनने जा रहें है | ये प्रयोगिक कार्यशाला के माफ़िक है जहाँ भट्टी में पहले उस लोहे को तपाया जाता है जिस से बनने वाला है हथोड़ा, ताकि जोहरी भट्टी की गरमाहट से मुखातिब हो जाएं| मैं था अपने कुछ सवालो की खोज में, ग़ालिब फरमाते है कि

क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब
आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की”

इब्तिदा में ये बात साफ़ हो जाती है कि वादे, वादे खिलाफी का सबसे बड़ा तमगा है और उम्मीद, तश्नगी की सबसे बड़ी कसूरवार | तो जनाब ये जो सर्कल है ये इस बात को चस्पा कर रहा है कि जहाँ तुम हो वहां हम है और वहीँ सब है | अगर आप इस बात के कयास लगा रहे है कि इस हिमालय से कोई गंगा निकलेगी तो आपको ख़ुद चलकर देखना पड़ेगा| जब तक आपके नाख़ून उस में डूबेंगे नहीं, आप के पाँव ठंड से ठिठुर नहीं जाते और पसीने की बू जब तलक न पसंद आने लगे उसमे और आप में वहीँ अन्तर है जो आप माउंट एवेरस्ट पढ़ खड़ी बछेंद्री पाल और हम में हैं | ये एक औपचारिक यात्रा बिलकुल नहीं है, ये अनवरत है | एकला चलो रे …एकला चालो रे ..|

कितनी दफ़ा हमने गुजारी जिंदगी को आइसोलेसन से हटकर पूर्ण एक रूप में देखने की कोशिश की? “सो ग्राम ज़िदगी” के मायने विभिन्न स्तर और हालत के दरमियाँ बदलते और बिगड़ते रहें| मेरी आंखे बीते तीन महीनो में हुए ब्रेकअप, प्यार, इमोशन, रोजगार में उलझकर रह गई| उसकी बिनाई को दुरस्त करने की बजाय में बिछाता रहा परदे, मैंने उन दृश्यों से आँखे फेर ली जो मुझे असहज करते हैं, मैं हक़ीकत को नकारता रहा ताकि खुशफ़हमी की शरण में जी सकूँ | जाने कितने खूबसूरत लोग मेरी जिंदगी का हिस्सा रहें, और कब मैंने उन्हें याद किया| एक पेज पर उतरी हुई जिंदगी वो आइना है जिसे वक़्त- बेवक्त टटोलते रहना चाहिए क्योंकि अमूमन हम खुद से वाकिफ़ नहीं होते|

गाँव में कई मर्तबा ऐसा होता है कि जब आप गलत जूते या चप्पल पहन लो जो आपके पैरो के मुताबिक न हो तो वो आपको काटने लगते है और वहां पर एक घाव जन्म ले लेता है| आमतोर पर हम जिंदगी में कब किसी के जूतों में इस कदर प्रवेश कर जायें कि उस घाव का महसूस करने लगे| यही समानभूति है और व्यवहारिक और शाब्दिक भाषा में ये सहानभूति से परे है| सहानभूति आदमी को कमजोर करती है और समानभूति मजबूत | ये संजीदगी, ये अहसास और इस बात की अनुभूति बिना उन्हें समझे आना नामुमकिन हैं|

कानपूर से लगभग 75 किलोमीटर दूर एक गाँव और बारात शाला जहाँ मेहमान, मेजबान का स्वागत करते है | सब से बड़ी हक़ीकत ये ही कि हम नही जानते कि किस कदर हम उनके बदलाव में सहायक है लेकिन हम इस बात से अच्छी तरह वाकिफ़ है कि वो उनकी भागीदारी हमारे बदलाव का हिस्सा हैं|

एक रात, उस गांब में जहाँ आप पहली दफ़ा कदम रख रहें हो और आपके परिचित कोई भी आपके सामने नहीं होते, हो सकता है कि जेहन में ख़ौफ का आलम हो, नजरो में भरोसा न हो और आसमां से तारे आपकी आँखों में झांक रहे हो और जुगनू टिमटिमा रहें हो | जहाँ शशांक तारो को देखते हुए इस बात का विचार करता है कि एक ओर गाँव में बिजली नहीं है और दूसरी ओर ये खूबसूरत खुला आसमान, जहाँ मुंबई से आई एक लड़की भरपेट खाना नहीं मांग पा रही हो और संभव है स्वछता अभियान के गांधी के चश्मे को नजरंदाज कर आप लोटा लेकर कहीं बैठे हो और हल्के भी न हो पायें| खैर इसका उलट भी संभव है| उस रात का सवेरा सब के लिए एक नया सवेरा होता है|

ये दुनिया तेजल दी की सुनाई कहानी की तरह ही है जहाँ सूप बन रहा है और दिलचस्प बात ये है कि हर वक़्त गेंद आपके ही पाले में है, अब सवाल ये है कि आप इस सूप की बेहतरी के लिए क्या कर सकते है| ब्लू और रेड में से हर दफ़ा चुनाव आपके सामने है आप कौनसी ऊँगली थामेंगे? इस से पहले सूप जलकर ख़ाक हो जाए और आप मूकदर्शक बने रहे तो आपकी जिम्मेदारी का क्या ? आपकी आँखों का क्या ? प्याज़, गोबी न हो तो छोडिये अलबत्ता में तो नमक लेकर भी दौड़ लगा दूँ|

सेवा, फिक्सिंग और मदद के बीच जो महीन लाइन है वो एक बड़ा खाली स्थान लिए हुए है| किस तरह मदद करना सेवा से परे है और जब आप सेवा करते है तो केवल आपकी ताकत ही नहीं वरन आपकी कमजोरियां भी सेवा में लग जाती है| रेचल आगे कहते है कि सेवा के मूल भाव में हम सब जुड़े हुए रहते है हमारे दुःख हमारे सुख सब| सेवा हमें हमारी पूर्णता व इसकी शक्ति का एहसास कराती है। सेवा हमें हमारी पूर्णता व इसकी शक्ति का एहसास कराती है।

ये छोटी पलिया गाँव है जहाँ के सात साल का एक बच्चा शनि आपकी एनर्जी पर सवाल उठा सकता है| वो सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक आपके आगे आगे दौड़ता हुआ मिल जाएगा| जब आप थक कर खाना खाने लेने के बाद अनमने मन से उठने को तवज्जो न दे रहें होंगे तभी वो पूछ लेगा भैया अमिया खाने चले? और आप दूर खड़े आम के पेड तक जाने की बजाय थोडा सुस्ताने लगे तो वो अपने साथियो के साथ कुछ देर में हाज़िर होगा और आपके हाथो में थमा देगा छोटी छोटी पांच अमिया| जहाँ कि प्रिया, प्रियंका की आवाभगत आपको विस्मित कर देगी| जहाँ एक झोपडी नुमा जगह पर मास्टरजी बतियाते हुए मिल जायेंगे| गाँव वालो के बर्तन, छोटू भैया का खाना और मंदिर के पास वाले हेंडपंप का पानी |

सुधा और ईश्वर, दो ऐसे युवा जिनसे प्रभावित हुए नहीं रहा जा सकता | अपने घर में जीरो वेस्ट की तर्ज पर रहने वाले एक तालब को पुनर्जीवित करने की तमन्ना लिए ये चेन्नई से कानपूर के गाँव गंगाधार निवादा पहुँच जाते है| उनकी आँखों के तन्नी, तन्नी के लिए निकल आती है| उनकी बातो में सादगी का परचम होता है और संजीदगी की हवा बहती रहती है| उनकी आवाज हमेशा निर्माण की तरफ और उनकी ख़ामोशी निर्वाण की तरफ ले जाती है| तालाब को दो अलग अलग रूप में देखना और कचरा बम को विभिन्न जल के स्त्रोतों में डालना उनके बिना संभव नहीं था|

हम खुद के एक्शन से कितने अनभिज्ञ होते है? क्या हम जानते है कि एक कप कॉफ़ी में 140 लीटर और एक जोड़ी जूतों में 8000 लीटर पानी खर्च होता हैं| हम खुद को उस रूप में स्वीकार करने में कितने सहज है जहाँ हम गलत है | हम हमारी कमजोरियों को क्या उसी तरह देख सकते है जैसे हम हमारे मजबूत पक्ष को देखते है|

वक़्त है कि थोड़ा ठहर कर जवाबो में सर खपाने की बजाय सवालों की तरफ थोडा ध्यान दिया जायें | जौन एलिया साहब का एक शेर है कि

“कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा”

प्रखर भैया माउथ आर्गन लिए और अपनापन, तेजल दी के डीजेम्बे की गूंज के साथ गहरी समझ , शशांक की उंगलियों से निकलती कलिंगा की ध्वनि और भिन्न सुविचार, माल्लिका के हाथो में बजती टफरी उलझता मूवी मेकर, रक्षा के थिरकते हाथ, सुधा की मुस्कराहट, ईश्वर की कहानियां, आकांशा की रंगोली और संध्या की बाते, नींद और खाना और अनिशा की भागदोड़ ने एक ऐसे मंथन की नीव रखी जहाँ आयें 26 शख्स अपने आप को चन्द दिनों में अंकुरित महसूस कर सकें| इस अंकुरण का पेड में बदलना एक लम्बी प्रक्रिया है लेकिन शुरुआत जरुरी है|

मुझे व्यक्तिगत रूप से ग्राम्य मंथन एक कविता लिखने के माफ़िक लगता है जिसकी सर्जन प्रक्रिया के लिए उस से गुजरना बेहद जरुरी है| इसके अनुभव इतने गाड़े है कि उन्हें किसी तरल पदार्थ की तरह आप बहा नहीं सकते | ये वो खुशी है जो मुझे अपनी पहली रोटी तवे पर फूलने पर हुई थी, ये वो आंसू है जिसे बरसो पहले में गिराना चाहता था|

बहरहाल एक गीत चल रहा है, आप भी सुनिए

“उठो कबड्डी कबड्डी खेले सरहदों पर 
जो आयें अबके तो लोटकर फिर ना जाए कोई
इन लकीरों को जमीं पर ही रहने दो 
दिलों में ना उतारे”

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हज़ार राहे मुड़ कर देखी, गुलज़ार और सदा

क बेबुनियाद शक की जद में आकर शबाना, काका को छोड़ मायके जा बसती है । राहे बदलने से मंजिल क्या अपना स्थान बदल लेती है ? मंजिल और राहों का राब्ता किसी समीकरण में बैठाने से नही बैठता । ना गणित का कोई सिद्धान्त ना न्यूटन का कोई नियम, नीत्शे का दर्शन भी नही और गीता का सार भी नही ।

दूरियों को नापने का कोई पैमाना सटीक तो नही होता लेकिन संभवतः खत्म करने की कोशिशें जरूर है , अलग अलग तरीके है । दूरियां केवल आंखों की होती है । शबाना जैसे काका को देखती है, यहाँ आप केवल आप नही होते । जब कोई आपको देख रहा होता है तो ये वो उस दृश्य की बात करता है जिसमे आप आते हो । फिल्मे जैसे फ्रेम की बात करती है, कहानियाँ जैसे भूमिका की, मैं चाय की और वो पहाड़ों की ।

बेखबर काका एक किरदार को अपने हाथों से लड्डू ख़िलाते है और शबाना की आंखे उसे सौतन देखती है । अलबत्ता जिसे आप माँ कहते है वो सास कहती है , जिसे एक वर्ग अहिंसा का देवता मानता है एक दूसरा वर्ग उसे बरदाश्त नही कर सकता ।

“बड़ी वफ़ा से निभाई तूने हमारी थोड़ी सी बेवफाई”

नाराजगी खत्म होने पर अहसास जिरह करने लगता है कि कैसे नादानी और छोटी छोटी गलतियां बेवजह ही दूरी की वजह बनी हुई है। लेकिन तब तक दोस्त इनर्सिया आपको जकड़ लेता है । एक लंबी खामोशी, चुप्पी तोड़ना तो चाहती है लेकिन कैसे । ये जो नयूटन का पहला सिद्धान्त है कि जो जैसी स्थिति में है वैसे ही रहेगा जब तक बाहरी बल, लेकिन कम्बख्त तेरे मेरे बीच ये बल तो भोराया हुआ है ।

शबाना आज भी वही चश्मा लगाती है जो काका ने भेजा था अपनी पसंद का । वो चश्मा पहने आईने के सामने तन्हा बैठी रहती है । एक निर्मोही पति उसी मौड़ पर इंतज़ार करता है जहाँ से उनके रास्ते बदल गए थे । मुझे याद आता है कि वो अक्सर मुझसे कहती है कि मूव आंन कर जाओ ।

” जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे, वो मोड़ अब भी वही खड़े हैं ”

जब रिश्ते गहरे होते है तब हम कितनी शिद्दत से एक दूसरे हो विचारों के विरोधाभास के बाद भी स्वीकार कर पाते है । गर ऐसा संभव नही है तब एक कदम भी भँवर बन जाता है और खिलाफ उठाया गया वो कदम वामन की तरह जिंदगी नाप लेता है ।

“हम अपने पैरों में जाने कितने, भंवर लपेटे हुए खड़े हैं”

दूरियों में एक पड़ाव ये भी आता है जब हम हमारी स्थिति को उससे रूबरू करना चाहते है । ये वो वक़्त होता है जब दोनों तन्हा है, दोनों के हालात नाकाबिले बर्दास्त है,दोनों की करवट खाली है, दोनों के दर्द का आलम चरम पर है । ये जो आग लगी है लगता है कि मेरा घर ज्यादा जला है और तभी एक अनभिज्ञ बात उतरती है कि

“कहीं किसी रोज़ यूं भी होता हमारी हालत तुम्हारी होती जो रातें हमने गुज़ारी मरके वो रात तुमने गुज़ारी होतीं ”

विसाले यार अलसाई सी आंखों से देख रहा है वहीं हिज्र है कि अब भी ईगो की शिकार बनी है । आख़िर कब तक जब शबाना का बेटा भी उसी की तरह लस्सी पीने लगा है और वो अब भी उसी चाय की चुस्कियां ले रहा है । ये कौनसा किवाड़ है जो केवल एक धक्के का मुंतज़िर है जिसकी कुंडी तो खुल चुकी है । जिद की जद में इश्क़ सिसकियां लेता है । मिलन का तानपूरा बजने को आतुर है लेकिन उंगलियां है कि अब भी मुठ्ठी में कैद है । बानगी देखिए

“उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते हमें ये उम्मीद वो पुकारें
है नाम होंठों में अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गई दरारें”

और अंत मे एक तरफ मेरी उम्मीद और दूसरी तरफ मेरे बिस्तर के तकिये में दबी आवाज़

“हज़ार राहें, मुड़के देखीं कहीं से कोई सदा ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई”

हिंदी मिडियम – अंग्रेजी भाषा या क्लास

अंग्रेजी नहीं बोल पाते ? क्या आप दोस्तों में या ऑफिस में शर्म महसूस करते है ? पब्लिक में अंग्रेजी बोलने से लगता है डर? अगर हाँ तो आजाइए एक मात्र विकल्प, फ़लाना कोचिंग क्लास, स्थान – डिनका बिल्डिंग के प्रथम तल पर |

२ साल पहले जब गाँव पहुंचा तो वहाँ न्यू जनरेसन पब्लिक नाम से एक नया विद्यालय शुरू हुआ | उसकी मार्केटिंग के लिए एक पोस्टर पर नज़र पड़ी, जिस पर देवनागरी भाषा में लिखा था – अंग्रेजी माध्यम विद्यालय |

इरफ़ान खान एक देसी लड़का, कपड़े सिलवाने आयी एक लड़की सबा से इश्क़ कर बैठता है | तो जनाब 15 साल बाद ठेठ आदमी तो ठेट ही रहता है और मोडर्न गर्ल सबा हो जाती है और भी मोडर्न | भाई अपना धंधा जमा लेता है और भाभी अपनी स्टाइल |

ये वो दुनिया है जहाँ गाँधी और विनोबा का खादी का सिद्धांत कहीं किताबो में धुल चाट रहा है और खादी को फैशन से जोड़ कर देखा जाने लगा | ये वो दौर है जहाँ असली माल जब आपकी कीमत से बाहर हो जाये तो फर्स्ट कॉपी मिलती है | यहाँ धोती को देसी कहकर नहीं, नयी फैशन कहकर मार्केट में उतारा जाता है | खाना, पीना, रहना, घुमना सब इस मानसिकता का शिकार हुए तो फिर भाषा कैसे बचती |

अच्छा विद्यालय, ऊँची शिक्षा, नयी तालीम फ़िर रेपुटेड कॉलेज जहाँ से डिग्री फ़िर नौकरी तत्पश्चात रूतबा जिसे अंग्रेजी में कहते है स्टेटस | मोहतरमा सबा को इस स्टेटस की चिंता अपनी बेटी जिसकी उम्र 5 साल होगी के लिए सताने लगती है | सबा कहती है कि वो अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ी तो अच्छा ये नहीं होगा ये नही होगा और वो डिप्रेसन का शिकार हो जाएगी और डिप्रेसन में कही उसने ड्रग लेना शुरू कर दिए तो | इरफ़ान कहता है रुको रुको मातारानी |

दिल्ली में अच्छे विद्यालय में नर्सरी एडमिशन, उसके पीछे गरीब बच्चो का कोटा और उसका सच | दीपक डोबरियाल एक बात कहता है कि हम खानदानी गरीब है, ऐसा नहीं की पहले अमीर फ़िर गरीब फिर अमीर, गरीबी हमारे खून में है | ये वाक्य वर्तमान व्यवस्था पर तमाचा है |

एक तरफ जहाँ हिंदी बोलना मना है वहीं दूसरी और प्यार ही एक भाषा है | एक ओर हिंदी बोलता बच्चा अपराध बोध से ग्रस्त हो सकता है वहीँ दूसरी और चार पंक्ति अंग्रेजी पढ़कर बच्चा अपने पालक की आँखों में आंसू ला सकता है | एक और जहाँ स्कूल के हिसाब से किटी पार्टी आयोजित की जाती है वहीँ दूसरी तरफ अपने दोस्त की बच्ची की एड्मिसन के लिए दीपक चलती कार के नीचे आ जाता है |

फिल्म में इरफ़ान आपको हर बार की तरह अवतरित होते नज़र आते है | ये वो अभिनेता है जो अपने करेक्टर के लिए पैदा होते है उसी में रम जाते है |

अंग्रेजी बनाम हिंदी को मुद्दा बनाना मुर्खता है | भाषा मनुष्य नही होती है अत: उनमे ईर्ष्या नहीं होती | या तो एक भाषा के गले में दूसरी तावीज़ की तरह लटककर उसकी उम्र बढ़ा देती है या एक, दुसरे के पाँव की पायल बन उसे और मधुर कर देती है |

अंग्रेजी बोलना रुआब कब से होने लगा | स्टेट्स बनाने के लिए जो चीज़े समाज अपनाता जा रहा है वो एक मिथक है जो दूध में पानी की तरह घुल गया है | पहले गाड़ी, बंगला, नोकरी स्टेटस, धन दौलत स्टेटस में आने लगा | कुछ लोगो ने राजनितिक और सामाजिक ताकत को स्टेट्स बना लिया | एक छोटा कुनबा जब धड़ाके से अंग्रेजी में बतियाने लगा तो एक बड़े कुनबे के लिए वो भी स्टेटस बन गया | जहाँ नौकरशाहों ने उसे मज़बूरी भी बना दिया |

गाँधी ने कहा कि “यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में मुझे इंसाफ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए | बैरिस्टर होने में मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता | दुसरे आदमी को मेरे लिए तर्जुमा कर देना चाहिए | यह गुलामी की हद नहीं है तो और क्या है?” उस वक़्त की अंग्रेजो की गुलामी आज वैचारिक गुलामी में बदल गई है | जहाँ व्यक्ति स्वतंत्र होकर भी स्वतंत्र नहीं है |

हिन्दुस्तान में रहकर हम हिंदी बोलने वाले प्रधानमंत्री की तारीफ़ करते है जबकि ये तो सामान्य बात होनी चहिये | गत दिनों उज्जैन से दिल्ली आते वक़्त जब मैं ‘पीली छतरी वाली लड़की’ किताब पढ़ रहा था तो मेरे सामने वाली सीट पर बैठी लड़की जिसका नाम निधि था कहती है आप हिंदी किताब पढ़ रहे है सो कूल ना आजकल हिंदी पढने वाले कहाँ मिलते है | मैंने कहा इसमे कुलनेस की कोई बात नहीं, मालवा का लड़का होते हुए हिंदी पढ़ना कूल बात नहीं आम बात होनी चहिये | एक और औरत साथ में सफर कर रही थी उनकी तीनो बेटियां साथ में थी एक चौथी में और दो छटवीं में | मैंने पूछा “इंदौर का स्कूल कैसा है जहाँ ये पढ़ती है” | उन्होंने तपाक से उत्तर दिया “बहुत बढ़िया है, तीनो इंग्लिश में बोल लेती है” | इंग्लिस बोलना मापदंड कबसे हो गया | क्या ये हमारी भाषा की दुर्बलता है या वैचारिक गुलामी की हिंदी किताबे इतनी कम बिक पाती है |

ये वैचारिक गुलामी इतनी ज्यादा फ़ैल चुकी है कि हो सकता है आप दिल्ली मेट्रो में मैला आंचल निकालते वक़्त संकोच करे | पार्क में किसी से बात करने की शुरुआत आप जानबुजकर अंग्रेजी में करे | व्हाट्सअप या मेसेंजर में किसी को अंग्रेजी से इम्प्रेस करने की फ़िराक में हो |

आखिर स्टेट्स है क्या ? क्या कारण था कि विनोबा ने कहा कि मैं केवल उतने ही रूपए कमाऊंगा सूत कातकर जो भारत का आम आदमी कमाता है केवल 6 पैसे | तुकाराम और एकनाथ कभी दस गाँव की परिधि से बाहर नहीं निकले | गांधी ने कहा कि अंग्रेजो से कह दो कि मैं अंग्रेजी भूल चूका हूँ | क्या हम वर्तमान प्रधानमंत्री का कार्यकाल हिंदी बोलने के आधार पर तोल सकते है ? अगर नहीं तो फिर अटर बटर अंग्रेजी बोलने वाला आपसे बड़ा कैसे हो सकता है |

अंग्रेजी एक भाषा है उसे पढ़िए उस से प्यार कीजिये लेकिन उसे स्टेटस ना बनाए | उसे बोल कर आपके अन्दर सुपेरिओरिटी काम्प्लेक्स नहीं आना चाहिए वर्ना कल कोई आपके सामने फ्रेंच बोलेगा तो आपको इंफेरिओरिटी काम्प्लेक्स का शिकार भी होना पड़ सकता है |

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का – औरत की कहानी रोज़ी की जुबानी

रोज़ी, ‘लिपिस्टिक वाले सपने’ किताब का वो किरदार है जो अमूमन हर औरत के अन्दर सुलगता है। इस किरदार की दशा, दिशा और द्वंद को वक़्त, मंच और सपने परिभाषित करते है – लिपिस्टिक वाले सपने।

रोज़ी, रोज़ाना हमारी आँखों के सामने से गुज़रती है। कभी वो किसी की मोबाईल के विडियो में, कभी अपने गुस्साए पति की लात में, हाईड किये गए मेसेज़ में, कॉलेज के बहाने काम करते किसी एन.जी.ओं या बेंड में, अपने माशूक की कमर को कस के पकड़े हुए उसके कानों में बुदबुदाती हुई बाइक पर या सातवें पहर में मोबाइल पर अपने नए साथी के लिंग की फ़ोटो मांगते हुए अदृश्य रहती है। इसकी वाज़िब वज़ह है, समाज का अधिकांश हिस्सा ऐसे लोगो को उजाले में देखना मुनासिब नहीं समझता जबकि अँधेरे में वो ख़ुद इसका हिस्सा बनने को लालायित रहता है।

भोपाल की एक पुरानी इमारत के अन्दर रहती बुआजी, शिरिन, रिहाना और लीला के पनपते सपनों की कहानी है लिपस्टिक अंडर माय बुर्का। बुआजी उम्र के उस पड़ाव में है जहाँ उनकी शरीर की मांग को संतुलित करती चंद किताबे है। ये किताबें आठवी क्लास के बच्चे की विज्ञान की किताब के अन्दर, बेंक की तैयारी करते छात्र के मोबाइल में और किसी वृद्ध के बिस्तर के नींचे पाई जाती है। विभिन्न तरीकों से इन्हें नकारने वाला समाज ‘सविता भाभी’ और ‘अन्तर्वासना’ के कन्जूमर बेस के आगे आँख मिचता रहता है। उषा जी की आँखे स्विमर ट्रेनर पर ऐसे टिक जाती है जैसे अर्जुन की मछली की आँख पर, और गुल्लेर मारते लड़के की पकी अमिया पर। वो रोज़ी की आवाज के साथ ट्रेनर के कानों के समीप पहुँच जाती है। वो काली ब्रा पहनकर और लिपस्टिक लगा कर रोज़ी बनना चाहती है। जिस्म की ये कौनसी मांग है जो रोज़ी के कपड़े बाथरूम में उतरवा देती है, ये कौनसी चाहत है जो 55 वर्षीय उषा को मोबाइल की आवाज़ में ट्रेनर के जिस्म तक पहुंचा देती है। उठती आह और खुलते कपड़े जाने कितनी बाथरूम के सच है जहाँ नल चालू होते ही एक आह जन्म ले लेती है और जिस्म मचलने लगता है। सब कुछ परोक्ष है तो फ़िर प्रत्यक्ष क्या है? क्या एक 55 वर्षीय उषा ट्रेनर की रोज़ी हो सकती है? क्या बुआजी का “लिपिस्टिक वाले सपने” पढ़ना जायज है? उम्र, जिस्म और सेक्स का क्या रिश्ता है?

शिरिन एक ऐसी सेल्सपर्सन है, जो दरवाजों पर जा जा कर सामान बेचती है और उसकी योग्यता के बदौलत उसे सेल्स ट्रेनर बना दिया जाता है। इस किरदार की वास्तविक हक़ीकत की परतें उसके पति के घर में दाख़िल होने पर खुलती है, जिसकी नज़र में शिरिन एक जिस्म है जिसके कमर के ऊपर का हिस्सा गायब है। वो कंडोम से परहेज़ करता है, उसे बीबी की इच्छा और हेल्थ की परवाह नहीं। उसकी आवाज कहती है कि बीबी हो शोहर बनने की कोशिश मत करो

अम्बर रंजना पाण्डेय की कविता ‘मुझे अमृत नहीं आईपिल चहिए’ इस किरदार पर हुबहू उतरती है। बंगाली फिल्म ‘तीनकहों’ में आशिष विद्यार्थी से उसकी बीबी पूछती है कि आख़िर कब उसने उसे प्यार से गले लगाया और उसे किस किया? अलबत्ता शिरीन तो अपने पति के लिए चोकलेट केक बनाती है, उसकी आँखों में अभी भी उम्मीद है, प्यार है। लेकिन फ़िर वो उस रात का हिस्सा बन जाती है जिसे कानूनी भाषा में मेरिटल रेप कहा जाता है लेकिन समाज की नजरो में हक़।

रिहाना घर पर बुर्का सिलती है लेकिन कॉलेज में जींस पहनती है। वो लेड जेपेलीन के गीत ‘स्टेयरवे टू हेवन’ को गाती है, वो लिपस्टिक वाले सपने के लिए हद से गुज़र सकती है। ये दोहरा रवैया आज के मिडिल क्लास की आदत बन चुका हैं जहाँ ग्लोबलाइजेशन और वातावरण उन्हें मुहैया तो डबल चीज़ पिज़्ज़ा और चोकलेटी पेन केक दिखा देता है लेकिन समाज उन्हें परोसता है समोसा कचोरी और पोहा। ऐसे में सपने उस और धकेल देते है जहाँ कुआं है और हो सकता है एक सुबह जिस पर आप भरोसा कर बैठे थे आपको कहे मैं तो आपको जानता ही नहीं। क्या बुर्का फैशन नहीं हो सकता? क्यों जींस को गलत माना जाता है? कौनसा डर है जो घर पहुँच कर कपड़े बदल लेता है? रिहाना के सिगरेट पीने को उसकी आज़ादी से जोड़ा जाना एक भयानक स्थिति है, ये बिलकुल वैसा ही है जैसे शराब को कूल बना देना और जिस्मानी सबंध को जरुरत नहीं फैशन।

लीला एक उलझती लड़की है जो भागना चाहती है सपनों के पास। वो शहर शहर घूमना चाहती है, उन्मुक्त, स्वेच्छा से उड़ना चाहती है। लेकिन ये वो मिडिल क्लास लड़कियां है जो रास्ते की बात नहीं करती, मंजिल इनकी आँखों में इतनी आग लगा देती है कि रास्ते धुंधले हो जाते है। ये अपनी ही सगाई में अपने बॉयफ्रेंड के साथ खुद के सेक्स का विडियो बनाते हुए कहती है कि साले धोखा दिया तो एम्एम्एस बना कर डाल दूंगी। इनकी फिसलन इतनी तेज होती है कि ये चोंट खा बैठती है। एक तरफ जहाँ अँधेरे में उसे सब कुछ आसान लगता है वहीँ दूसरी तरफ़ वो अपनी अर्रेंज मेरिज के लिए खुद निर्णय नहीं ले सकती। वो अपने होने वाले पति पर कामुकता से हावी हो सकती है, वो अपने बायफ्रेंड से चिल्लाकर कहती है सेक्स तो करले। ये वो वक़्त और स्थिति है जहाँ चाल आपके बस में नहीं होती जहाँ आप इतनी गति में होते हो कि पत्थरों पर आपकी नज़र नहीं पड़ती।

ऐसे वक़्त में घुटने छिलना लाज़मी है और तब आपके आसपास होते है केवल आप, उनके नाम भले ही कहीं शिरिन हो, कहीं उषा तो कहीं लीला। तब आप अपनी जिन्दगी की फटी हुई किताब को जोड़ कर देखते हो जिस पर लिखा होता है “लिपस्टिक वाले सपने”।

मेरी एक कविता है ‘ताउम्र लिखकर भी कवि’ उसकी एक पंक्ति है कि “मैंने औरत के हस्तमैथुन पर कभी बात नहीं की”, ये फ़िल्म इस पंक्ति का विस्तार है। ये बंद कमरों के औरतो के आह, आदत, स्थिति, उम्मीद और सपनो की खुली कहानी हैं जो खिड़कियों से अँधेरा होते ही छलांग लगाकर बाहर आ जाती है और बुर्के में कैद कर लेती है लिपस्टिक।

मुक्ति-भवन – मोक्ष का वेटिंग रूम

गुस्ताव फ्लौबेर्ट कहते है “ देयर इज नो ट्रुथ, देयर इज ओनली परसेप्शन” | मौत की बात करते वक़्त क्या हम इस विचार से मुत्तफ़िक़ हो पाते है | मौत अंतिम सत्य है या कोई परसेप्शन यहाँ भी गठित होता है |

युवा लेखक और निर्देशक शुभाशीष बड़े अनूठे तरीके से मुक्तिभवन के जरिये मौत, परिवार, जीवन और प्रकृति की बात करते है | एक मध्यमवर्गीय परिवार, एक कुम्लाही बीबी जिसका हर चीज़ के प्रति अपना नजरिया है, एक अलमस्त बेटी जो दादा के साथ अपना रूम शेयर करती है, एक हठी पापा जिनका ख्याल है कि उनका वक़्त आ गया है और एक मैं ( साधारण इंसान )| मैं ये फिल्म आदिल की निगाह से देखता हूँ |

विकिपीडिया के अनुसार मौत किसी जीवन की प्रक्रिया करने की शक्ति को समाप्त करने की क्रिया को कहते हैं। फिल्म कहती है कि मौत एक प्रक्रिया है | खाने की टेबल पर बतियाते बतियाते दया दादाजी को लगता है कि उनका वक़्त आ गया है और अब उन्हें एक धूम धाम से इस जीवन से विदा ले लेनी चाहिए | मैं सोचता हूँ ये कैसा बेहूदा ख़याल है, क्या कभी सुव्यवस्थिक रूप से मरा जा सकता है | अगर मरने की परियोजना बनाई जाए तो शायद इसका भी एक नया ही मार्किट तैयार हो जाये और बड़े लोगो की भाषा में इसे कूल डेथ या सेक्सी डेथ कहा जाने लगे | खैर वर्तमान में कैसे मरना है येफैशन नहीं है |

मुक्तिभवन बनारस में एक भवन है जहाँ लोग मरने आते है और माना जाता है कि जो वहां प्राण त्यागेगा वो मुक्ति पा लेगा और इस जन्म मरण के बंदन से मुक्त हो जायेगा | मोक्ष को एकनाथ एवं ज्ञानेश्वर ने एक लालसा बताया है और असली संत मोक्ष की चाहत से मुक्त होता है | विनोबा कहते है कि मोक्ष की कामना करना भी एक कामना है | सेवा ही सबसे बड़ा मोक्ष है |

अपने हाथो पर सोते वक़्त लोसन लगाती लता, आदिल से पूछती है “कितने दिन लगेंगे?” | सवाल शायद जायज़ नहीं लेकिन ब्रॉड प्रस्पेक्टिव में देखे तो जरुरी है | आदिल घर को ऑफिस बनाए बैठे है और काम कर रहे है | “मेरे हाथ में यमदूत की लिस्ट रखी हो जैसे” आदिल जवाब देते है और लाइट बंद हो जाती है | हमारे समाज में गुस्सा जाहिर करने के बहुत तरीके है और उतने ही मौके |

हाथ रिक्शा,बनारस की गलिया, पंडित कम मैनेज़र मिश्रा जी और मुक्तिभवन | मुक्तिभवन में अनेक कमरे है जहाँ सिर्फ़ आप 15 दिन रह सकते है अगर इतने दिन में मोक्ष मिल गया तो ठीक | जमीन से मरे कीड़े को उठाते हुए मिश्रा जी कहते है की मोक्ष मिल गया इसे | कमला मुक्ति भवन में पिछले 18 साल से रह रही है और वो अपने पति के साथ मरने आई थी | हर 15 दिन में उसका नाम बदल जाता है | झूठ मुक्तिभवन के दरवाजे के भीतर शमां गया है खैर क्या फर्क पड़ता हिया क्योंकि यमराज क्या इतना अपडेट होगा | मरने की कोशिश नहीं की जा सकती |

मुक्तिभवन जो मोक्ष के निकट का एक द्वार है जहाँ से मौत अपना रास्ता तय करती है वहां सब उड़नखटोला देखते है | जब चीज़े सीमित हो तो छोटी छोटी चीजों का महत्व पता चलता है और वक़्त, जगह मिलकर उसकी कीमत तय करते है |

सुनीता ( पालनी गोष ) को मैंने मामी फिल्म फेस्टिवल की एक फिल्म नाचूम इन कुम्पसार, जो गोन संगीत पर आधारित थी में पहली बार देखा था | सुनीता अपने दादा के बेहद करीब है और वो उनकी मित्र जैसी है | पिता जब पिता होता है तो उसे पता नहीं चलता कि वो किस हद तक अपनी संतान को नाराज़ कर रहा होता है |

मरना एक प्रक्रिया है, मौत मर जाने वाली प्रक्रिया की समाप्ति है | दो तरह की मौत की बात की जाती है एक अगति और दूसरी गति | मरने के बाद अगर आदमी अर्चि मार्ग पर जाए तो वो ब्रह्मलोक पहुँचता है | छान्दोग्य उपनिषद आत्मा के स्तर के बारे में बात करता है जहाँ तुरीय अवस्था में वही आदमी पहुंचता है जिसे मोक्ष मिल गया हो |

फिल्म लय दर लय भीतर खुलने की बजाय मानवीय चीजों पर केन्द्रित होती जाती है | जहाँ कमला और दया गंगा में नाव में घूम रहे होते है और एक दूजे का हाथ थामे बाहर आते है | जहाँ सुनीता एक नया मोड़ ले लेती है और उसके जवाब समाज पर सवाल खड़ा करने लग जाते है | एक शोक सन्देश पढ़ते हुए व्यक्ति कहता है कि वो तो अपना शोक सन्देश खुद लिखकर मरेगा |

चीज़े व्यक्तिव सहेज लेती है लेकिन व्यक्ति को सहेजने की अनुमति प्रकृति नहीं देती | कुछ शोध बताते है कि मौत एक एवोल्युसीन है और ये जीवन लेने के तरीके पर निर्भर होती है | अगर आपको अगला जन्म मिले तो आप क्या बनोगे ? कितने लोग वापस इसी योनी में आना चाहेंगे | “मैं तो कंगारू बनूँगा” |

एक डायरी, कुछ इच्छाये, डायरी पढ़ती सुनीता और सुनता आदिल | मुक्तिभवन में आप आने की तारीख लिख सकते हो जाने की कौन लिखेगा ? मौत का कोई विकल्प नहीं होता | अत: हम क्या कर सकते है ? नाजिम अली का एक शेर है

ऐ हिज्र वक़्त टल नहीं सकता है मौत का

लेकिन ये देखना है कि मिट्टी कहाँ की है |

( फिल्म में सारे कलाकार संजिंदगी से अपने किरदार जीते है | नाचूम इन कुम्पसार Let’s dance to the rhythm को बनाने में पुरे 10 साल लगे और इस फिल्म के गीत कमाल के है जो सारे कोंकणी म्यूजिक से लिए गए है | फिल्म जेज़ संगीतकार क्रिस पेरी एंड लोरना पर आधारित है | )

 

 

 

 

 

 

 

नागेश्वर पांचाल- दस कविताए

ईश्वर मर चूका है

बेतहाशा भाग रहें है,

बेकतार में, मृत्यु की ओर

आदमी, आदमियत,कुदरत और ख़ुदा |

कठघरे में सब के सब

किस पर चले मुकदमा

लाश दे रही है गवाही

सुनो

“मैं गीता पर हाथ रखकर कहता हूँ

ईश्वर मर चूका है” |

ख़ाली झूलते फंदे

एक अधूरी ग़ज़ल

मिट्टी में दफ़न हुई और

अंकुरित हो गए ,

असंख्य मतले |

वेदना, संवेदना, विषाद

रिश्ते, राजनीति, अहसास, एहसान

रकीब, हबीब

सब जोड़ दो

लेकिन गैरवाजिब

और नामुमकिन है

मतले का मकता होना |

यारो,

फंदे में गर्दन भयानक है ,

पर सबसे भयानक है

आँखों में बसे

असंख्य, अनन्त

ख़ाली झूलते फंदे |

(रोहित की आत्महत्या पर उसकी याद में )

गर्दन दर्द करने लगी है

आसमान को सीधा कर

एक दीवार बना लो |

गर्दन दर्द करने लगी है

कुछ लोगो की

सूरज को देखते देखते |

कुछ तो अजीब पागल है

कहते है सीधे सीधे,एक साथ तारे

अच्छे नहीं लगते

आसमान बुड्वक है

थोड़ी जात पात सिखावो

भला धुर्व तारा सबके बीच

कैसे रह सकता है ?

अरे इन सप्तर्षियों को तो

दिन में भी निकलना चाहिये |

जाने के कई रास्ते होते है,

सुबह सुबह उठ कर

दूध का

खाली पतेला देखा

तो समझ गया

बिल्ली जा चुकी है |

जरा सा अहसास नहीं होता,

दबे पांव जाते है ऐसे लोग |

कोई जाता है, आँख दिखाकर

तुम मेरे लायक नहीं |

कोई जाता है आँख बचाकर

बेपर्दा होकर मिलाई नहीं जाती |

वो पांव छु कर गया

लगता है बहुत दिनों तक लौटेगा नहीं

जो गले लगकर गया

याद आती होगी अब भी उसे

और तुम जबसे गए हो

तब से पीठ में दर्द है |

सच में

जाने के कई रास्ते होते है |

धीरे धीरे बन्दर बनाया जाता है जनता को
_______________________________________________

एक चतुर आदमी
एक हाथ से ताली बजा रहा है |
हमें लगता है कि
हमारी भी हथेली शामिल है
चारो ओर उठती इन आवाजो में |
लेकिन हमारी हथेली की जरुरत
नदारद है इस शोरगुल में |
बन्दर सोचता है कि
वो दिखा रहा है तमाशा
लेकिन हकीकत ये है कि
बन्दर तमाशा है |
भयानक है ये द्रश्य कि
बन्दर को तमाशा बनने पर
जरा भी दर्द नहीं |
धीरे धीरे बन्दर बनाया जाता है जनता को
ताकि कल कहीं चौक पर उसका
तमाशा बनाया जा सके |

काश कोई ट्रेन हमसे गुज़रकर

_______________________________________________________________

ऐसा माना जाता है कि

दो सामान्तर रेखाए

क्षितिज़ पर कहीं मिलती है |

लेकिन ये नहीं पता कि

क्षितिज़ कहाँ मिलता है |

शायद मिलना जरुरी नहीं है,

जरुरी है साथ-साथ समान्तर चलते रहना

क्षितिज़ की खोज में |

मिलना बिछड़ने की प्री- क्रिया है

तो मिलने की प्री- क्रिया

साथ साथ चलना तो कतई ना हुई |

हम दोनों पटरियाँ है,

काश कोई ट्रेन हमसे गुज़रकर

बनारस तक चली जाए |

 

मेरे जख्म को देख नमक डर जाता है

ये हाल मेरा बस उसी के सर से जाता है,

मेरे जख्म को देख नमक डर जाता है |

आसमान पर जो चलने लगे है वो अब

कभी कभी सर उनका जमीं से टकराता है |

मैं भी कुछ देर चल कर देखूं जरा

पर बता ,कोनसा रास्ता वापस नहीं आता है |

इसे हिकारत मानूं या कहूँ नादानी

सूरज जमीं पर गिरकर भी इतराता है |

ओडिसी किताब

अपना सा महसूस करता हूँ

हे ओडिसियस तुम्हे |

मैं तुमसा पराक्रमी नहीं

ना ही सूर्य सा आभामंडल मुझमे

तीर्वता में, मैं शून्य हूँ |

विवेक खो देता हूँ अक्सर

दिल के किसी छल में आकर |

ना तुम सी बुधिमत्ता,

ना वो अनुपमेय वाकचातुर्य |

किसी रणभूमि में नहीं मौजूद

मेरे जिस्म की एक भी बूंद

फ़िर भी

ओ ज्यूस-सम्भूत लेयरतीज के पुत्र ओडिसियस

जोड़ देता है मुझे, तुझसे

एक खामोस दर्द |

कहीं तुम मेरा अतीत तो नहीं हो गई |

__________________________________

मैं अतीत से

हाथ मिलकर चलता हूँ

और अतीत

मेरे पाँव खींचता है |

मैं भुलाना नहीं चाहता हूँ उसे

किसी चुनावी घोषणा की तरह |

मैं याद करता हूँ उसे रोज़,

किसी प्रेमिका के अधूरे वादे के माफ़िक |

अतीत से हम कुछ कह नहीं सकते.

अतीत हमारी जुबान छीन लेता है |

अतीत हमें सब क्कुह कह सकता है,

वो हमारे कान मजबूत करता है |

जो मैंने और उसने,एक साथ बिताया है |

वो मेरा और उसका, एक ही अतीत नहीं है |

वर्तमान का अतीत से वही रिश्ता है

जो भविष का वर्तमान से है |

अतीत किसी किसी दिन अचानक

आँखों के सामने आ कर खड़ा हो जाता है |

वर्तमान का अतीत हो जाना

एक धीमी प्रक्रिया है |

अतीत का वर्तमान में आ जाना,

इसके ठीक विपरीत है |

अतीत ऊर्जा को नष्ट किया जा सकता है

और पैदा किया जा सकता है, सिद्धांत का सबसे पुख्ता सबूत है |

ऊर्जा को एक रूप से दुसरे रूप में बदल सकते है |

तुम कभी चुपचाप बैठे बैठे मेरा रूप लयों नहीं बदल देती |

मैं भविष्य में खड़ा कहीं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ या

अतीत में कहीं नींद की झपकियाँ ले रहा हूँ |

अगर तुम चाहो तो, मैं वर्तमान होना चाहता हूँ |

अतीत से आँख मिलाना

उतना ही मुश्किल है

जितना तुमसे |

कहीं तुम मेरा अतीत तो नहीं हो गई |

अनारकली ऑफ़ आरा – आइस पाइस

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा |

दुष्यंत का ये शेर मसान की शुरुआत में आये चकबस्त के शेर के पास ना चाहते हुए भी खींच ले जाता है | “हमको देखे सुरती फांके, चोर नज़र से लहंगा झांके” के साथ रंगीला डांस की प्रस्तुति |

स्टेज पर आप डांसर के साथ मासूम बच्ची को देख रहें होते है उसकी आँखे आपको आकर्षित करे तो इसमे कोई अलग बात नहीं है | उसकी आँखे और तमाम दर्शक की आँखों में केवल एक हकीकत का अंतर है | फिल्म का ये क्षणिक द्रश्य तीन हिस्सों में स्वत: बंट जाता है, एक नाचती नर्तकी, दूसरा उसके पीछे बैठे लोग और तीसरा उसे देखते दर्शक | “सरक सरक सरकाईले कि लहंगा मारेला जोर” उत्तेजना की उपज लापरवाही और लापरवाही की बंदूक की आवाज़ | जब कोई आवाज जोर से होती है तो काफी कुछ शांत हो जाता है |

दृश्य बदलता है क्योंकि चंद आँखे बदलती है लेकिन फिर से वहीँ परिस्थिति | वो मासूम लड़की जिसकी आँखे आपको आकर्षित कर रही थी पान चबाते हुए आती है और अब उसकी आइडेंटिटी है देसी तंदूर विदेशी ओवन अनारकली ऑफ़ आरा |

“कस के उधेडता है, कुछ तो रगड़ता है, दुखता है चुभता है, धीरे से घुसता है कानो में कह के कविता” | स्वरा भास्कर आपकी आँखों से अब लगभग गायब हो चुकी है और जो हकीकत का पाटा उस बच्ची और दर्शक के बीच था वो ढह चूका है अब आपके सामने जो है वो है अनारकली आफ आरा | अगर मैं इस वक़्त आरा में होता तो ये सांग्स सुनने जरुर दर्शको के बीच बैठा होता | “ ऐ सखी तू अरे ना सखी टिका” | पंकज त्रिपाठी रंगीला को अपने रंग में रंग चुके है | वो आपको चंद सेकंड का समय नहीं देते कि आप नील बट्टे सन्नाटा के टीचर या गेंग्स आफ वासेपुर के सुल्तान के तनिक भी नजदीक जाये | रंगीला इस टोली के प्रोग्राम करता है और वो वास्तविक मानवीय प्रेम, अप्रेम, हकीकत, ओकात से जुड़ा साधारण इंसान है | वो दोष को समय की रूप रेखा में देखता है अत: वो नायक नहीं है | इस फिल्म की नायक है अनारकली |

वीसी शुक्ला ( संजय मिश्रा ) अनारकली के एक प्रोग्राम में आते है | संजय मिश्रा एक जादुई एक्टर है उन्हें किसी भी सांचे में डालकर सांचा लाइट केमरा एक्शन के साथ खोल सकते है | वीसी शुक्ला तथाकथित कवि और एक यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर है | उन पर सीएम का हाथ होता है जो आज की राजनीति का विश्वविद्यालयों में दाखिल हो जाने की तरफ भी इशारा करता है | वीसी की चाटुकारिता, वीसी का दस हज़ार ईनाम देना, जुगाड़ की बोतल में शराब पीना और अनारकली की थिरकन के साथ “ऐ जरा घिस ले, तनिक रगड़ ले, ऐ दरोगा दुनलिया में जंग लागा हो” | वीसी पर अपनी पोजीशन और नशे का नशा स्टेज के ऊपर पहुंचा देता है जहाँ कामवासना अपना रंग दिखाती है और फिर अमुक साधारण दर्शक, विवश रंगीला | “महफ़िल से लई जा उड़ई के मुझे, घूंट घूंट मुझको गटक जा रे | अति की अति नहीं हो सकती एक जोरदार तमाचा | दृश्य का बदलना स्वाभाविक |

अनारकली का रिपोर्ट लिखवाना, आम आदमी की बात को नजरअंदाज करना और उसके सबूत को ख़त्म करना | खैर समेटना तो यहाँ भी जायज नहीं | पुलिस, राजनीति जिसे लगती है तो साढ़े साती के लगे शनि से भी ज्यादा घातक होती है | अनारकली का ये स्वीकारना कि अलग होता तो कोई बात नहीं थी हम हेंडल कर लेते | हम कोई पवित्र नहीं है लेकिन सबके सामने | फिल्म फिर मानवीय मुद्दों को इस डायलाग से रूबरू करवा देती है | ये जो पब्लिक इमेज है वो पर्सनल इमेज कतई नहीं है | पब्लिक इमेज को हर वर्ग का आदमी दुरस्त चाहता है और इसमे कोई बुराई नहीं लेकिन प्रॉब्लम ये है कि क्या वो सच है ? गर ये सच नहीं तो ये नाटक गंभीर है और ये अपने तरीके से समाज को कुतरता है | हम सब खुद को कुतर रहे है |

अनारकली का अपने साथी के साथ दिल्ली पहुंचना और हीरामन उर्फ़ हैरी मैन (इश्तियाक खान ) से मिलना फिल्म में नया आयाम रचता है जहाँ संभावनाए दिखाई देती है | उम्मीद आदमी को कंधा देती है और इसका ताल्लुक उसके रीढ़ की हड्डी से बिल्कुल नहीं है | रीढ़ की हड्डी जमीनी हकीकत है जिसे आप नजरअंदाज कर सकते हो लेकिन नकार नहीं सकते | हाँ अगर आप उसे स्वीकार ले तो उसकी मजबूती पर ध्यान दिया जा सकता है |

हीरामन वो व्यक्ति है जिसके लिए देश आरा है और कहीं ना कहीं मिटटी की खुशबू उसकी ऊपर वाली जेब से टपकती रहती है | हीरामन बैंगलोर, पुणे में काम कर रहे वो तमाम सोफ्टवेअर इंजिनियर हो सकते है जिन्हें केवल दिवाली होली नहीं बल्कि गाँव के पेड़ पर लगे बेर का स्वाद भी बुलाता है और याद आता है | इनका एक तकियाकलाम है कि “मेरे लिए ना सही देश के लिए” | जब वो थंब्स अप का साइन देते है तो लगता है कोई अपना है | मुलाकात की इब्दिता में जो पाँव छूता है वो अंत में अपने हाथ अनारकली के सर पर रख देता है | बिछड़ना मिलने की प्री क्रिया है | फिल्म के निर्देशक अविनाश दास उनसे बार-बार कहते शूट पर कहते थे ‘इश्तियाक़ यह किरदार मेरी आत्मा है। इसमें नकली कुछ मत करना।

एक दृश्य में वीसी के पास एक औरत और एक आदमी संस्कृत के प्रोफ़ेसर के नोकरी के लिए आते है | चंद दृश्य बाद वीसी को फिर उसके साथ दिखाया जाता है जो स्पष्ट था | दृश्य को रचने के लिए उसके प्री दृश्य को रचना पड़ता है | ये औरत उस मानसिकता की परिचायक है जहाँ सब कुछ घर की सहमती से चलता है और औरत को इस बात की आज़ादी दे दी जाती है कि वो अपने जिस्म का फ़ायदा उठाकर कुछ पायें |

अनारकली वापस आरा में होती है, ये घर वापसी एक रिवेंज है जहाँ दुनिया से भागना खुद से भागना होता है | जिस मानसिकता के लिए अनारकली का वीसी से द्वंद्व होता है उसकी मानसिकता का फ़ायदा उठाकर वो बरी हो जाती है | ये दुनिया एक महाभारत है यहाँ सारे दांव जायज होते है | यहीं ये फिल्म पिंक से जुदा है और इसकी तुलना पिंक से करना एक भूल नहीं मुर्खता है |

एक बायसनेस की बात की गई है कि हम गाने वाले लोग है तो कोई आसानी से बजा भी देगा | वहीँ फिल्म के एक सीन में किसी के बुलावे पर अनारकली की मम्मी को उठकर जाते हुए दिखाया गया है | फिर से स्टेज सजता है फिर अनारकली की आवाज गूंजती है | ये फिर से एक दोहराव नहीं है, ये पुनरावृति नहीं है | क्योंकि सच को मोबाइल से डिलीट नहीं किया जा सकता, वो एक दिन अपना मुँह उठाकर चला आता है | अत: आईना सामने होता है जिसे ठुकराने का वक्त वीसी के पास नहीं होता |

“रंडी, रंडी से कम या तुम्हारी बीबी को आइंदा छूने से पहले पूछ लेना” | फिल्म के अंतिम दृश्य में अनारकली एक शेडो लाइट से बाहर निकती है और म्यूजिक उसकी चाल के साथ बदल जाता है | बदलना नियति है लेकिन क्या बदलना है ये नियति तय नहीं करती |

खैर हालत तो

हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ए-ना-गहानी और है |

कौनसा छूना सही है कौनसा गलत इसका हक हर जिस्म के मालिक को है | नीयत की भी अपनी सीमा रेखा है और अतिरेक में शामिल हर चीज़ को नकार देना चाहिए | सही नीयत से छुआ गया गलत है गर वो जिस्म के हक़दार की नज़र में गलत है | एक महीन रेखा कई दफ़ा आपसी रिश्तों में भी टूट जाती है | पति- पत्नी, दोस्त, गर्ल फ्रेंड चाहे जो हो बेहद जरुरी है आपसी रिश्ते में एक्स्प्लीसिट बात |
मुझे अमिताव घोष की शैडो लाइन्स की में याद आती है जिसके साथ नायक थोड़ा आपत्ति वाला कृत्य कर बैठता है और वह। उस से कहती है कि तुम सुबह खुद पछ्तावोगे | खैर उनकी दोस्ती पर कोई असर नहीं पड़ता |

जहाँ तक जिस्म की निजता की बात है तो कुछ लोग ( मेल, फीमेल ) जिस्म का फ़ायदा उठाना बंद करे वर्ना हर फायदा कहीं ना कहीं एक बायसनेस को जन्म देगा | दोनों हाथो से ताली बजाकर इसे बंद किया जाना चाहिए |

ग्राम्य मंथन – आंतरिक परिवर्तन – 9 डेज विपासना

15723720_1370028976341088_447237369052030467_o.jpg36 यात्री, आंतरिक परिवर्तन की ओर अग्रसर, इनर मंथन एक मंच – ग्राम्य मंथन | सवालो से परेशान, जवाबों की खोज में विचलित, क्यों ना इस बार सवाल बदल दिए जाए | सवाल जिंदगी में जवाब से ज्यादा स्थान घेरते है जबकि वक़्त जवाबों की तलास में गुम हो जाता है | क्या कभी हमने सवालो की तलाश की ? गर नहीं तो जवाब मिलते ही सवाल बदल जाएगा |

आंखो के सामने सबसे पहले एक वाक्य आया- Let yourself be silently drawn by the stronger pull of what you love – Rumi. कितनी दफ़ा मैंने खुद को रोका है? कितनी दफ़ा मैंने खुद को नज़रअंदाज़ कर दिया? हम खुद को बेवकूफ बनाने में इतने माहिर हो जाते है कि खुशफ़हमी को ख़ुशी मान लेते है | क्या लोग चाहते है से क्यों ना, क्या में चाहता हूँ को सुना जाए|

साबरमती आश्रम, ह्र्द्यकुंज,वक्त 5 बजकर 55 मिनट, आकाश में मेहताब की चमक और मुन्तसिर आफ़ताब, खामोश ठंड | ये वहीँ जगह है जहाँ से चंद कदम की दुरी पर भारत की आजादी की छटपटाहट गूंजती थी | जहाँ बापू अपने निवास में चरखा हाथ में लिए देश को धीरे धीरे सहला रहे थे | जहाँ भारत के तमाम दिग्गज बापू से मिलने आया करते थे और देश को किस ओर ले जाना है पर बात होती थी | आज फिर वही बात की जाए वही से की जाए | कुछ दुरी से होले होले विनोभा की प्रार्थना की आवाज़ कानो में महसूस हो रही है…वैष्णव जन को ….

जयेश भाई पटेल (मानव साधना), सफ़ेद कुरता, एक अनुपमेय आलोक, दिलखुश आवाज़, हसमुख चेहरा | मैंने गाँधी को अपनी आँखों से तो नहीं देखा पर गर गांधी होते तो बिलकुल ऐसे ही होते | संगच्छध्वं संवदध्वं…सं वो मनांसि जानताम्…देवा भागं यथा पूर्वे….सञ्जानाना उपासते | कौनसी वेदना हमें चिंतित करती है? हम कहाँ तक सम सम वेदना को अनुग्रहित कर पाते है | जब हम पास्ट में रहते है तो प्रेशर में रहते है, जब हम फ्यूचर का सोचते है तो दिमाग में फियर अपना स्थान ले लेता है, प्रेजेंट में हम प्यार कर सकते है |

हमारी आँखों के सामने एक अद्रश्य लेंस लगा है वो लेंस सारे द्रश्य बदल देता है | क्या हम हमारा लेंस निकालकर, हमारी बायसनेस एक तरफ़ रख किसी को देख पाते है ? गर नहीं तो क्या हमें पता है कि ये कहाँ से आ रहा है, इसका स्त्रोत क्या है | प्रखर भैया बड़े ही स्पष्ट रूप से कहते है कि हम से कितने लोग कूड़ा उठाने वाले का नाम जानते है | कितनी दफ़ा हमने उन्हें बराबर बैठा कर खाना खिलाया है या चाय पिलाई है | क्या ये संभव है कि आपको आपके घर खाने बनानेवाली भाई या भैया खाने पर होटल लेकर जाये | आप इसे किस तरह स्वीकार करेंगे | कभी आपने उनके साथ थिएटर में फिल्म देखी है ? ये वाक्य जिसपर पूर्ण विराम लगा है,असंख्य प्रश्न पैदा कर रहा है |

हम ज़िदगी के हर पड़ाव पर कुछ ना कुछ कन्जूम करते रहते है और कहीं ना कहीं सोचते है कि कभी कंट्रीब्यूट करेंगे | लेकिन जरा एक नज़र गुमाइए अपने पिछले 4 सालो पर और सोचिए | कन्जूम नाऊ एंड कंट्रीब्यूट लेटर से हमें कन्जूम नाऊ एंड कंट्रीब्यूट नाऊ पर शिफ्ट होने की जरुरत है | क्या विश्व में डिमांड और सप्लाई में बैलेंस है ? गर नहीं तो कंट्रीब्यूट नाऊ पर चिंतन किया जाए और एक्शन किया जाए |

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ग्राम्य मंथन के बारे में बात करते हुए प्रखर कहते है कि क्या कोई ऐसी जगह बनाई जा सके जहाँ बाते सुनी जा सके | क्या सिर्फ़ अंडरस्टैंड से कुछ हो पायेगा ? आज विथस्टैंड की जरुरत है | विथस्टैंड सहानभूति से समानभूति की ओर ले जाता है |

निपुण भाई, एक अनुपम औरा, ज्ञान और विज्ञान का जोड़, सर्विस ( सेवा) का एक पर्याय, science tells in his own words “ I am 99.9% empty space and .1% vibration in constant flux. | उनके शब्दों में “सिंपल पेयुपल हेव डिफरेंट काइंड ऑफ इंटलिज़ेंस” | केपिटल के अलग अलग प्रारूप, रंग रूप में पाया जाता है, लेकिन डीपेस्ट फार्म ऑफ़ केपिटल जो होता है, वो होता है लव | दो अलग अलग तरह से लोग और विभिन्न कंपनिया लोगो की एक तरह से रेटिंग करती है – आई क्यू और इ क्यू | लेकिन एक रिक्शा वाला जब पैसो से भरा बेग आपको लौटा देता है तो उसे कैसे एक्सेल सीट में डालोगे ? एक तीसरा तरह का कोशेंट होता है क्म्पेस्सन कोशेंट |

एक केस स्टडी, 2 पेज़, म्यूजिक कुछ मिनट का साइलेंस..मौन की आवाज़… मत कर माया को अहंकार ..मत काया को अभिमान.. काया घार सी काची..काया घार सी काची ..जैसे ओसारा मोती…हेल्प,सर्विस और फिक्सिंग…जब हम किसी की हेल्प करते है तो कहीं ना कहीं हम में सुपिरियोरिटी काम्प्लेक्स का जाता वही दूसरी और लेने वाले में इन्फेरिटी काम्प्लेक्स आ जाता है | जब हम किसी चीज़ को फिक्स करते है तो हमारी बायसनेस में पहले ही ब्रोकन शमा जाता है | लेकिन जब भाव सेवा/ सर्विस का होता है तो समर्पण जन्म लेता है और प्यार..अनकंडीसनल लव आकर लेने लगता है |

भ्रुपद, एक गाँव लीलापुर, एक सर्किल, भाव में जोश और एक्शन में समझ, पॉवर ऑफ़ एक्सेप्टेंस | ये गाँव है, ये सच्चाई है, कागज़ी आकड़ो से परे, जमीनी हकीकत | जब हम सुबह किसी को इम्प्रेस करने निकलते है तो शाम तक खुद डिप्रेस होकर लोट आते है | जब हम किसी चोज को सुधारने जाते है तो हम कही और दलदल में फस जाते है | गाँव को सुधारना नहीं समझना है | जयदीप भैया कहते है कि इस गाँव के लोगो को इंग्लिश तो नहीं आती लेकिन वो समझ चायनीज़, जर्मनी सब लेते है | यहाँ आने के २ महींने भीतर उन्हें ब्रह्म ज्ञान हो गया था | लगभग 10 साल से इस गाँव में बस से गए है | ये समर्पण एक आत्मशक्ति देता है |

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एक बार विनोभाजी ने गाँधी से पूछा था कि हमारे काम का रिजल्ट क्या होगा? गाँधी ने बड़े प्यार से जवाब दिया कि हम जो भी करते है अंत में सब शून्य हो जाता है | हम बस हमारी संतुष्टि के लिए करते जाते है | सेवा में परिणाम का नहीं सोचा जाता | जयेश भाई जहाँ कहते है कि प्रखर( संस्थापक – यूथ अलायन्स ) बहुत क्लियर है वहीँ प्रखर भैया कहते है कि मुझे नहीं पता कि हम जो कर रहे है उसे कैसे इम्पैक्ट में डाला जाए | ये इनर चेंज है जिसे किसी एक्सेल सिट में डालना मुश्किल है |

कुछ सवाल खुद से उठाना बहुत जरुरी है कि जब हमें कोई कुछ देता है किसी भी प्रारूप में तो फ़िर हम उसे किसी अगले रूप में वापिस क्यों करना चाहते है? ये बराबर करने का कोई तरीका है क्या ? मेरे ख्याल से रिटर्न नहीं रिपीट होना चाहिए |

व्यक्तिगत रूप से मैं इन दिनों में, एक अहम् बदलाव का हिस्सा रहा हूँ | बदलाव का विटनेस होना वाकई बहुत शक्तिशाली होता है | जब आप खुद को होल्ड करते है तो तो आपको रुकना पड़ता है आपको झुकना पड़ता है, आपके अहम आपसे प्रश्न करते है, आप खुद को बदल पाते है समझ पाते है | हेंड, हेड ओर हार्ट की ये जर्नी विपासना की तरह है और अंत में एक बात जेहन में चुपचाप घर कर जाती है कि बदलाव मुमकिन है और बदलाव जरुरी है | बैकग्राउंड में बहुत कुछ चलता है …कहीं  से आवाज़ आ रही है …चलो सुना जाए..

ऐसा सख्त था महाराज..जिनका मुल्को पे था राज़..जिनके घर झूलता हाथी…जिन घर झूलता हाथी जैसे ओसारा मोती …झोका पवन का लग जायेगा..झपका पवन का लग जायेगा..काया धुल हो जासी….

 

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

एक तरफ दिवाली का मिलन सामारोह अपनी पुरजोर सव़ाब पर था वहीँ दूसरी ओर किसान गाय,भेंस को मेहंदी करने में लगे थे | खेतो पर जानवरों के सिंग रंगे जा रहे थे | लोगो की चाय की चुसकिया ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी | मैं ललित और मोहन एक मीटिंग ख़त्म कर गाँव के पुराने हॉस्पिटल के पास पहुंचे | पहली नज़र में वहां का नजारा देख मेरी आँखों में ठीक वैसी ही सुखद अनुभूति थी जो मंदिर के सामने एक घूम हुई चप्पल मिल जाने पर होती है |

पुराना हॉस्पिटल,जब से नया हॉस्पिटल खुला है कुछ लोगो के शराब पीने का अड्डा, कुछ लोगो के लिए कचरा घर बन गया था | नए के वजूद में पुराने को नजरांदाज करने की फ़ितरत काफ़ी चीज़े बिना कुछ कहे छीन लेती है | ये बात वो अच्छी तरह समझ सकता है जिसे दो बार इश्क़ हुआ है | क्योंकि “राते और भी है वस्ल की रातो के सिवा” ( फैज़ साहब ) |

कुछ युवा अपने दिवाली के कपडे बदल कर हाथ में फावड़ा, तगारी ओर कुल्हाड़ी लिए हमारे साथ हॉस्पिटल में प्रवेश कर चुके थे | धीरे धीरे सफाई अभियान में 40 से ज्यादा युवा शामिल हो गए | कुछ ऐसे लोग भी जिन्होंने जिन्दगी में कभी घाँस नहीं काटी | “मेरा गाँव मेरी दुनिया” के इस प्रोग्राम को देखकर गाँव वाले दंग रह गए | गाँव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बिना किसी राजनितिक पार्टी और स्वार्थ के लोगो ने ऐसे काम को अंजाम दिया | देखते ही देखते पूरा हॉस्पिटल साफ़ हो गया |

“मेरा गाँव मेरी दुनिया” ने उस हॉस्पिटल के कुछ कमरों को पुतवाकर और साफ़ करवाकर वहां एक पुस्तकालय सेट किया | टीम और अन्य सदस्य की सहायता से अब फ्री नवोदय विद्यालय की तैयारी कराई जाने लगी है | गाँव वालो का उत्साह देखकर भविष्य में विभिन्न प्रोग्राम की नीव रखने की भी कमर कस ली गई है |

दिल्ली में एम्बियंस माल के नीचे खड़े एक हाथ में सिगरेट लिए जब लड़की कहती है आई कांट टोलरेट हिम जस्ट फक्ड और मध्यप्रदेश के किसी गाँव वाले पर टिपण्णी करते हुए कहते है कि जनता ही मुर्ख है परिवर्तन कैसे आ सकता है? कितना आसान लगता है एसी मैं खड़े रहकर दोष रोपना लेकिन कभी कल्पना करो उस लड़की की जिसे संस्कार और अधिकार में फर्क ही पता नहीं | जहाँ लडको से हाथ मिलाना भी शक की नज़र से देखा जा सकता है | उस लड़के से जाकर मिलो कभी जो रात में खेत में सिचाई करता है, डॉक्टर बनने के ख्वाब देखता है पर उसे पता ही नहीं की एंट्रेंस एजाम क्या होती है और क्या क्या आता है |

इसमे कोई दोराय नहीं की वो बदलाव मुश्किल है लेकिन यही बदलाव सबसे ज्यादा जरुरी है | गाँव के विकाश के बिना देश के विकाश का स्वप्न देखना मुर्खता है | मेरे गाँव से ही लोग जयपुर जोधपुर काम करने के लिए पलायन करते है कोई जयपुर, दिल्ली से मेरे गाँव में काम करने नही आता | धारणीय विकाश की तर्ज पर कैसे गाँव को सम्रध किया जा सक्ताब है ?
बेंगलौर के बड़े बड़े आईटी कैम्पस में बैठे गाँव के सोफ्टवेअर इंजिनियर कितनी मर्तबा गाँव लौटने की ख्वाहिश प्रोग्राम कर कर ख़त्म कर देते है |
मेरा गाँव मेरी दुनिया एक सोच है युवाओं को गाँव के विकाश में भागीदारी बनाने की, उन्हें मुख्य धारा में जोड़ने की | मेरे गाँव की हालात के लिए मैं भी जिम्मेदार हूँ |
निदा फाजली का एक शेर याद आ रहा है

“सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती है निगाहें
क्या बात है मैं वक्त पर घर पर नहीं जाता”

Tree and Temple School to Social Entrepreneurship

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Once upon a time, yes, every story that I heard in my childhood started like this so mine also. Once upon a time my niece came to my village with my sister during Rakhi. It was the time of her period and she forgot to carry pads. I thought pads were easily available in the village so I went to a shop, came empty handed then another shop then another. What I found that there were no sanitary pads available in our village. Some women were selling Clothes and that cloth was used during menstruation cycle. I was shocked. It was quite unbelievable for me. I was far away from the truth. I searched Google and visited our community to understand the reality. The facts I found were eye opener and shocking. Preventive health care had always been ignored by Indians resulting in loss of lives and money. This ignorance or reluctance is caused by lack of awareness and accessibility of genuine health care products. The situation is worse when it comes to women.

There is a quote by Nobel Prize winner Muhammad Yunus that “Social Entrepreneur is one who see the pain in the society and create a business around it to solve it”. I took the inspiration from the quote and formed an Organization Go-On India with Rajesh Kumar and Rohit Patidar. We started a production unit in Madhya Pradesh. At that time I was in 2nd year of my MBA.

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After starting production I realized that sanitary pad is a big taboo and just accessibility can’t solve the problem. So we developed Fellowship program for creating social leader from village to address the issues. In that program, Go-On India will train a girl fellow called The Nightingale who will be responsible for running the program in one district. We along with The  Nightingale will involve the school going girls. The Nightingale will select 2 Change maker girls from each school. We will give them special training which is designed in a manner that it covers all the aspects like awareness, communication, technical knowledge, sales and myths. The training will create strong leadership in them. The Nightingale along with the change makers will organize awareness camps in village and will try to educate more people. The Change makers will be our tools to provide sanitary napkin to girls, village women and to handle queries. A part of profit of Go-On India will be shared by these change makers.

Literature and School

My journey started from a small village Jhutawad which is 70 KM away from Ujjain. There is no proper school. Some of our classes were run under tree and in temple. Selection in JNV made a big difference in my life. JNV Ujjain was bigger than my village. I have never seen such school in my life. It was the first time I tested Paneer, Jack fruit and Pear. In 7th class I was introduced to Library, most wonderful place of my life. I started reading lots of books from Premchand to Shakespeare. I started taking part in the cultural programs. Mrs. Alka Kothari, Mrs. Rammurti and Mr. Anil Makode were not just teachers, but God in my journey. I explored lot of things because of encouragements and belief of these people. Then I started writing poems and short stories in my school life. I got Rajya Pal Award in Scout too.

First Short movie to Sanima

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In my engineering days I watched lots of movies and read many novels. In third year my old friend Rohit and I were talking about movies and suddenly we decided that we should make a short movie. I had already written many stories and a few plays. He was also active in his college extra curriculum activities. We did not even know how to write a screenplay, what is 180 degree rule of movie making. We looked for resources in Indore. People refused to work with us including a tea maker because we are young and knew nothing about filmmaking. When we discussed this to our extended family they declared as mad. Anyhow, with clear dedication in our mind we made our first short film named Corner table and it was covered by four news channel.

We faced lots of problems with our first film and there were lots of other artists too who were facing the same problem because there was no collaborative platform for it. So Rohit and I decided to create a platform and that’s how SANIMA was born. In two years we had made many short films under SANIMA and had worked with many artists. We even made a movie in 48 Hour for world 48 hour film project. One of our team members from SANIMA is selected for Film and television institute of India. Now we are planning to make feature films.

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Jagriti Yatra leads to Mera Gaon Meri Dunia 

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From 24 December to 8 January 2014 were 16 life changing days of my life. In Jagriti Yatra, we traveled around 8000 km and met all well known Social Entrepreneurs of India. The addressing of Anshu Gupta( Founder of Goonj) took away my comfort and forced me to think about the real India. The image of India we portray in our mind was quite different from the real one and I didn’t have a single clue how to bridge the gap between the two.

On 25 January 2015, I along with my local friends arranged a seminar for students and a panel discussion with local experts focusing how we can change the current education scenario of our area. Some students who were studying in different cities came together to offer their help and that’s how “Mera Gaon Meri Dunia” came into action. With the sole purpose of improving education “Mera Gaon Meri Dunia” is currently managing a learning center with Library in the village.

Struggle in Social sector and SSE

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Go-On India was founded to provide hygienic health care product up to the last person in the queue. But our production capacity was unable to cope up with the demand. Also there was no proper fixed supply chain system so we were facing problems to reach out the women of the villages. Then I was selected in the first cohort of the School for Social entrepreneurs, India’s Social startup fellowship program. Expert session at SSE cleared lots of things and showed us necessary skills while Witness session provided us experience, motivation and strength.

Now with Go-On India, we want to see a world where every woman is healthy and happy.

Here are the links

mera-gaon-meri-dunia

Go-On India

sanima